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Gustakhi Maaf: केजी से पीजी तक शिक्षा मुफ्त ही होनी चाहिए

By Om Prakash Verma
Published: October 29, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
केजी से पीजी तक की शिक्षा मुफ्त ही होनी चाहिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एकदम सही कहा है। ऐसा सिर्फ छत्तीसगढ़ में नहीं बल्कि पूरे देश में होना चाहिए। वैसे भी सामान्य स्कूल कालेजों में मिल रही शिक्षा सिवा एक अर्हता के और क्या है? केजी पढ़कर निकलो तो पहली कक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा दो। 12वीं पास होने के बाद नर्सिंग, फार्मेसी, मेडिकल, इंजीनियरिंग, होटल मैनेजमेंट, पालीटेक्नीक, यहां तक कि आईटीआई में भर्ती होने के लिए भी प्रवेश परीक्षा दो। स्नातक के बाद बीएड के लिए प्रवेश परीक्षा देनी पड़ती है। जिस मार्कशीट की खुद उच्च शिक्षा संस्थानों में कोई इज्जत नहीं है, उसके लिए कोई पैसे क्यों खर्च करे। विद्यार्थी केवल सीखने के लिए स्कूल-कॉलेज जाए, पढ़ाई करे। वैसे भी सरकार को कोई खास नुकसान तो होना नहीं है। जितना पैसा वह विद्यार्थियों से बतौर फीस वसूलती है, उससे ज्यादा तो बालिका शिक्षा के विज्ञापन पर खर्च कर देती है। वैसे एक बात कभी समझ में नहीं आई। सरकारी स्कूल में शिक्षा कर्मी बनने के लिए भी परीक्षा दिलानी पड़ती है। अर्थात् जो श्रेष्ठ गुरुजी होते हैं, वो सरकारी स्कूलों में चले जाते हैं। फिर भी लोग निजी स्कूलों की फीस भरने के लिए क्यों तैयार रहते हैं। क्या सरकार अपने शिक्षकों से काम नहीं ले पाती? क्या शिक्षकों से शिक्षण के इतर ज्यादा काम लिया जाता है? वैसे स्कूल कालेजों में टाइम वेस्ट की बात करें तो निजी स्कूल-कालेजों में विद्यार्थियों का टाइम कहीं ज्यादा वेस्ट होता है। बातें भले ही लोग सनातन की करें पर मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेन्टाइन डे सभी कुछ मनाया जाता है। बात-बात पर केक काटना तो पूजा से पहले दीपक जलाने जितना ही जरूरी हो गया है। जब से शिक्षण की गुणवत्ता नापने का नया बखेड़ा शुरू हुआ है, कालेजों में कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई है। लोग विकिपीडिया से ढूंढ-ढूंढ कर दिवस विशेष निकाल रहे हैं और उसपर कुछ न कुछ कर रहे हैं। बात-बात पर स्कूल कालेज के बच्चे नारे लगा रहे हैं, रैलियां निकाल रहे हैं, नुक्कड़ नाटक खेल रहे हैं। माटी शिल्प, रंगोली, मेहंदी के वर्कशॉप हो रहे हैं। इसलिए रोजगार योग्य ग्रेजुएट तैयार नहीं हो रहे। छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी भले कम हो, पर ढंग का रोजगार गिनती के लोगों के पास ही है। पोस्ट ग्रेजुएट भी सुबह से शाम तक घिसकर 10-15 हजार रुपए ही पैदा कर पाते हैं। इससे ज्यादा तो साप्ताहिक बाजार में सब्जियां बेचने वाला कमा लेता है। ऐसे में आशा की एक पतली सी किरण नजर आती है। बिलासपुर का एक कालेज सेल्समैनशिप की ट्रेनिंग दे रहा है। इंटर्नशिप में उसके विद्यार्थी स्कूल-कालेज और घरों में जाकर उत्पादों का प्रचार प्रसार कर रहे हैं, उसे बेचने की कोशिश कर रहे हैं। और कुछ हो न हो, वह रोजगार योग्य तो बन ही जाएगा। दिशा सही रही तो पांच-छह साल में डेढ़-दो लाख रुपया महीना कमा रहा होगा।

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