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Gustakhi Maaf: कितना बिगड़ गया लोकतंत्र का चेहरा

By Om Prakash Verma
Published: March 20, 2025
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
1947 में आजाद हुए भारत में पहले चुनाव 1951-52 में हुए. इसके साथ ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने की राह पर चल पड़ा। 74 साल के लोकतंत्र का चेहरा मगर अब बेहद दागदार हो चुका है। राजनीतिक दल अपराधियों के सबसे बड़े पनाहगाह बन गए हैं। भले ही देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो गया हो, भले ही वह लोकतांत्रिक देशों की अगुवाई करने की सोच रहा हो पर जो हाल यहां लोकतंत्र का है, वह निराश करने वाला है। जो लोग विधानसभाओं या लोकसभा में बैठे हैं, वो जनता के प्रतिनिधि कम और राजनीतिक दलों के उम्मीदवार ज्यादा हैं। पार्टी जिसपर छाप लगाकर छोड़ देती है, वह विधायक-सांसद बन जाता है। जाहिर है कि इसके बाद उसकी पूरी वफादारी अपने आकाओं के प्रति ही होती है। इस खेल का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि आपराधिक चरित्र के लोग राजनीति में जाकर सुरक्षित हो जाते हैं। चुनाव सुधार पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स की रिपोर्ट के अनुसार देश के 45% विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। कुछ राज्यों के आधे से ज्यादा विधायक दागी हैं। आंध्र प्रदेश के 174 में से 138, केरल के 134 में से 93, तेलंगाना के 119 में से 82, बिहार के 241 में से 158, महाराष्ट्र के 286 में से 187, तमिलनाडु के 224 में से 132, ओडीशा के 147 में से 85, कर्नाटक के 223 में से 122, झारखंड के 80 में से 43, उत्तर प्रदेश के 403 में से 200 विधायकों ने अपने चुनावी हलफनामे में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। जिन 1861 विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है उनमें से 1205 पर हत्या, हत्या की कोशिश, किडनैपिंग, बलात्कार और बार-बार बलात्कार जैसे गंभीर आरोप हैं। पहले अपराधियों को समाज खुद ही अलग-थलग कर देता था। कुछ अपराधी भागकर बीहड़ों की शरण ले लेते थे। पर अब अपराधी अपने दम-खम का प्रदर्शन कर राजनीतिक दलों में चले जाते हैं। नेताओं के काले-पीले को अंजाम देते-देते एक दिन वो खुद नेताओं का सबसे बड़े राजदार बन जाता है। फिर उसे पार्टी का ठप्पा मिल जाता है और वो गले में गमछा डालकर मंच की शोभा बढ़ाने लगता है। फिर एक दिन वह चुनाव जीतकर विधानसभा और लोकसभा में भी पहुंच जाता है। जिसे जनता अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजती है, खुद उसे भी चुनाव से कुछ पहले ही पता चलता है कि पार्टी ने उसे उम्मीदवार बनाया है। जनता अपनी आंखें मूंदकर पार्टी को जिताती है और इस तरह पार्टी जिसे चाहे जनप्रतिनिधि बनाने में सफल हो जाती है। जनता के सरोकार हाशिए पर चले जाते हैं। जैसे अंग्रेज जमींदारों और जमींदार लठैतों को पाला करते थे, वैसे ही अब सरकारें अपने जमींदारों और उनके लठेतों को पालने लगी हैं। क्या यही वह लोकतंत्र है जिसकी कल्पना, लोकतंत्र को अपनाने वालों ने की थी?

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