-दीपक रंजन दास
ओड़ीशा के बालासोर (बालेश्वर) में हुई एक ट्रेन दुर्घटना में 288 लोगों की मौत हो गई. कवच-फवच कहां गया, पता नहीं। दु:खद यह भी कि जहां दो ट्रेनें पहले ही भिड़ी पड़ी थीं, रेलवे के सदाबहार सिग्नल सिस्टम ने वहां तीसरी ट्रेन भी भेज दी। एक वाक्य में कहें तो सरकार से चल रही ट्रेनें तो संभल नहीं रही, वह रातों रात हाईस्पीड ट्रेन की दुनिया में पहुंच जाना चाहती है। इससे कम से कम भरे पेट वालों को सरकार की उपलब्धियां गिनाने का मौका तो मिल ही जाएगा। यह और बात है कि इन भरे पेट वालों में से अधिकांश अब ट्रेनों से यात्रा नहीं करते। वे या तो अपनी कार से जाते हैं या फिर सीधे फ्लाइट पकड़ते हैं। बहरहाल, कांग्रेस ने नैतिकता का तकाजा करते हुए रेल मंत्री से इस्तीफा मांगा है। पर यह भी दरअसल, एक औपचारिकता ही है। कुछ लोगों के मर जाने से अब किसी के कानों पर जूं नहीं रेंगती। नैतिकता-फैतिकता बीते दिनों की बातें हो चुकी है। अब तो एजेंडे की राजनीति होती है जिसमे जनता हमेशा से हाशिए पर रही है। नैतिकता की बात करें तो बहुत ज्यादा पीछे लौटने की भी जरूरत नहीं है। घटना 23 नवम्बर 1956 की है। देश को आजाद हुए ज्यादा दिन नहीं बीते थे। सीमित साधन थे, देश धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। ऐसे समय में हैदराबाद के निकट महबूबनगर में रेलवे पुल टूट गया। इस रेल हादसे में 144 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 200 से ज्यादा यात्री लापता हो गए थे। तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश कर दी थी। इसके बाद एक और हादसा हुआ। शास्त्री ने फिर से अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को सौंप दिया जिसे स्वीकार कर लिया गया। इसके सालों बाद रेल मंत्री नितीश कुमार ने एक रेल हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अगस्त 1999 को पद से इस्तीफा दे दिया था। अधिकारी भी इस मामले में पीछे नहीं रहे हैं। शिमला रेलखंड पर बरोग नामक एक स्टेशन और गुफा है। इस गुफा के नक्शे में कुछ गलतियों की वजह से दोनों तरफ से जब पहाड़ को काटा गया तो गुफाएं आपस में नहीं मिल पाईं। पहाड़ काटने का नक्शा इंजीनियर सैमुअल बरोग ने बनाया था। इस गलती के लिए अंग्रेज सरकार ने उनपर एक रुपए का जुर्माना लगाया। पर उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये। स्टेशन और टनल उनकी यादगार के रूप में आज भी मौजूद हैं। पर यह सब बीते जमाने की बातें हैं। तरह-तरह का इतिहास पढऩे वालों को इन घटनाओं से क्या? उन्होंने अपना-अपना फैसला सुरक्षित रख लिय है। जब तक फैसला सुनाने की घड़ी आएगी तब तक घटनाएं भुला दी जाएंगी। कुछ लोग निलंबित हो जाएंगे, किसी का प्रमोशन रुक जाएगा, दो चार बर्खास्त भी किये जा सकते हैं। पर देश इस हादसे को भी भुला देगा।





