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Gustakhi Maaf: अब तो बैन ही कर दो होली

By Om Prakash Verma
Published: March 4, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
कहने को तो होली रंग, उमंग और दोस्ती का महापर्व है पर अब इसपर इतने प्रतिबंध लग चुके हैं कि इसे बैन कर देना ही ठीक रहेगा. 1975 में आई फिल्म ‘शोले’ की होली में – रंगों में रंग घुल जाते थे, दुश्मन भी गले मिल जाते थे. इसके बाद 1981 में आई फिल्म ‘सिलसिला’ में इसका भाव – चाबे गोरी का यार, बलम तरसे रंग बरसे… तक जा पहुंचा. इसके बाद लोग इतना डर गए कि होली पर दोस्तों के जाना ही छोड़ दिया. तब तक डीजे-दारू संस्कृति का मंगल प्रवेश हो चुका था. अब बर्थडे, एनिवर्सरी, वेडिंग पार्टी की तरह होली भी डीजे-दारू के बिना अधूरी हो गई है. होली पर छोटे बच्चों की परीक्षाएं चल रही होती हैं. वे न तो लकड़ियां इकट्ठी करते दिखाई देते हैं और न ही होली खेलते. अमीर मोहल्ले के बच्चे अपने घर के सामने बाल्टी और पिचकारी लिए खड़े रहते हैं. वे आती-जाती कारों पर पिचकारी चलाते हैं. कालेजों दफ्तरों में होली की छुट्टी से पहले सूखी होली खेली जाती है. सारा क्रम गड्डमड्ड हो चुका है. होलिका दहन से पहले ही होली खेलकर लोग अपने अपने घरों में दुबक जाते हैं. हाथों में या तो स्मार्टफोन होता है या फिर टीवी का रिमोट. पुलिस सप्ताह भर पहले से ही तमाम किस्म की बंदिशों की घोषणा करने लगती है. होली के एक दिन पहले से उसे सड़कों पर देखा जा सकता है. बाइक-स्कूटी पर तीन सवारी करने वालों से लेकर नशे में गाड़ी चलाने वालों तक की धरपकड़ में वह व्यस्त रहती है. दारू दुकानों में होली पर ड्राइ डे रहता है पर पूरा शहर दारू में डूबा रहता है. लोग एक दिन पहले ही स्टाक खरीद लेते हैं. इस दिन ऐसे लोग भी पीते-पिलाते हैं जो साल भर शराब को हाथ नहीं लगाते. भांग बेचने वालों की भी चांदी हो जाती है. होली का नशा-छेड़खानी कनेक्शन इतना गहरा है कि लाख चाहो इसपर नकेल नहीं कसी जा सकती. नशा और छेड़खानी को हटा दो तो वैसे भी होली में बचता क्या है? कुछ लोगों की बड़ी इच्छा है कि वे एक बार मथुरा, वृंदावन या बरसाने की होली जरूर देखें. उन्हें बता दें कि यह होली केवल फिल्मों में ही खूबसूरत नजर आती है. वास्तव में ऐसी कोई होली होती नहीं है. दरअसल, किसी भी पर्व या त्यौहार को ढंग से मनाने के लिए परिवार, समाज और दोस्तों की जरूरत होती है. परिवार आपसी खींचतान में उलझे हैं, समाज दिखावे के पीछे भाग रहा है और दोस्त सोशल मीडिया पर सिमट चुके हैं. ऐसे में होली और नवरात्र अगर जीवित हैं तो इसके लिए ईवेंट कंपनियों और नेताओं का शुक्रगुजार होना चाहिए. शहर में इनके किये दर्जन भर भी आयोजन हो गये तो सोशल मीडिया पर रंग अपने पूरे शबाब पर होता है. सेल्फी, रील और शार्ट्स की इस होली को जो भी देखता है वह इसका दीवाना हो जाता है.

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