-दीपक रंजन दास
कहते हैं इंसान की उत्पत्ति बंदरों से हुई. लाखों साल पहले बंदर पेड़ों से उतर कर धरती पर आ गए. फिर उनकी कमर सीधी हुई और वे दो पैरों पर चलने लगे. जरूरत खत्म होने पर पूंछ भी झड़ गई. सीधा खड़ा हुआ तो दिमाग कुछ और बेहतर हुआ, हाथ फ्री हुए तो कुछ और हुनरमंद हो गए. वैसे, बालों से जुआं तो बंदल भी निकाल लेते हैं. हालांकि, डारविन के विकासवाद के इस सिद्धांत को धर्मशास्त्र नहीं मानते. सभी एकमत हैं कि मनुष्य का जन्म मनुष्य के रूप में ही हुआ. पर उसकी हरकतें देखकर तो डारविन ही ज्यादा सही प्रतीत होते हैं. यकीन नहीं आता तो सड़कों पर देखिए. वाहन चालकों को जितना खतरा आवारा मवेशियों से है, उतना ही पैदल चलने वालों और साइकिल सवारों से भी है. एक तो छत्तीसगढ़ में जेब्रा क्रांसिंग का कोई कंसेप्ट ही नहीं है. पैदल चलने वाले भी गाड़ियों के साथ ही चौराहा पार करते हैं. कुछ लोग आलस्य भरी चाल से गुजरते हैं तो कुछ लोग फुदकते हुए रास्ता पार करते हैं. कुछ लोग दोनों हाथ फैलाए सड़क पार करते हैं, मानो टेकऑफ कर जाएंगे. 30 सेकण्ड के लिए हुए ग्रीन सिग्नल पर गाड़ियां निकलें या पैदल वालों को जाने दें, समझ में ही नहीं आता. प्रशासन पैदल चलने वालों को जेब्रा क्रासिंग भले ही न दे पाया हो, फुट ओवर ब्रिज जरूर बनाकर दे दिया था. यह और बात है कि इसपर कभी कोई चढ़ा ही नहीं. फुटब्रिज, केवल शराबियों, जुआरियों और कुत्तों का आस्ताना बन कर रह गए. रायपुर का स्काईवाक आज भी लोगों को मुंह चिढ़ा रहा है. दरअसल, जितने भी उपाय ट्रैफिक को सुधारने के लिए किये गये हैं वो सभी सतही हैं. दुपहिया के लिए हेलमेट और चारपहिया के लिए सीटबेल्ट तक जाकर उसकी सोच अटकी हुई है. हेलमेट केवल सिर को बचा सकता है, दुर्घटना रोकने में उसकी कोई भूमिका नहीं है. हेलमेट केवल दुर्घटना जन्य मौतों को कम कर सकता है. जाहिर है कि मौतों की संख्या को कम करना ही इस अभियान का इकलौता उद्देश्य है. इसकी वजह भी है. 2021 में देशभर में 4,12,432 सड़क हादसे हुए जिसमें 1,53,972 लोगों की मौतें हुईं. पर हम भूल रहे हैं कि इस दौरान 3,84,448 लोग घायल भी हुए जिनमें से कई अपाहिज हो गए. इनका इलाज कराते-कराते पूरा परिवार गरीबी रेखा से नीचे चला गया. अकेले दिल्ली की बात करें तो यहां सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले पदयात्रियों की संख्या भी प्रतिवर्ष 500 से 800 के बीच होती है. कुछ दुर्घटनाओं के ये सिर्फ शिकार होते हैं तो कई दुर्घटनाओं में ये कारण होते हैं. जाहिर है कि सतही उपायों से सड़क हादसों को कम नहीं किया जा सकता. जरूरी है कि अच्छी गाड़ियों के सवार भी अच्छी क्वालिटी के हों. फोरलेन, सिक्स लेन सड़कों पर मवेशी और मवेशी सरीखे लोग न हों. वरना बंदर के हाथ में उस्तरा…
Gustakhi Maaf: यहां इंसान और मवेशी में फर्क करना मुश्किल




