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Gustakhi Maaf: नगर सैनिक लगाते फटका, धोते गाड़ी, पिलाते चाय

By Om Prakash Verma Published July 2, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
पुलिस में नियमित पुलिस, पीएससी और आईपीएस के अलावा नगर सैनिक भी होते हैं. इनमें बड़ी संख्या में अनुकम्पा नियुक्ति वाले या अल्प शिक्षित युवा होते हैं। विभाग का पूरा नाम है नगर सेना, अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाएं। ये ताश के जोकर हैं, जहां जरूरत पड़े फिट कर दो। वक्त पड़े तो ये बड़े कीमती होते हैं वरना इनकी कोई पहचान नहीं। वैसे, अंग्रेजी में इन्हें होमगार्ड कहते हैं। प्रशिक्षण के बाद इन्हें पुलिस, अग्निशमन अथवा किसी भी अन्य आपातकालीन सेवा में नियोजित किया जा सकता है। नियुक्ति चाहे कहीं भी हो, विभागीय कर्मचारियों के बीच इनकी कोई खास इज्जत नहीं होती। ये फाइलें लाने-ले जाने के अलावा टेबल कुर्सी साफ करने, गाडिय़ां धोने, नियमित कर्मियों को चाय पिलाने तक ही सीमित रहते हैं। छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में पुलिस ने इनका बेहतर उपयोग किया है। ये कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने से लेकर अपराध अन्वेषण तक में सहयोग कर रहे हैं। पर एक दर्द इनका रह-रहकर छलक जाता है। वह दर्द है पदनाम और काम के बेमेल होने का। ये कहते हैं कि नाम में सेना होने के बावजूद इनसे सिर्फ चपरासियों जैसा काम लिया जाता है। शिक्षा, प्रशिक्षण और नियुक्ति की शर्त ही इन्हें अपने-अपने विभागों में बेगाना बनाती हैं। वैसे, यही हाल उच्च शिक्षित युवाओं का भी है। वहां भी केवल पदनाम ही बदला है। डोर-टू-डोर मार्केट सर्वे करने वाले दिहाड़ी मजदूर भी अब एक्जीक्यूटिव कहलाते हैं। कॉल सेन्टर के कामगारों पर बिजनेस डेवलपमेंट आफिसर का टैग है। दरअसल, इसके अपने मजे हैं। मजदूर रखो तो श्रम कानून लागू होते हैं। तरह-तरह की जवाबदेही बन जाती है। ज्यादा काम कराओ तो ओवरटाइम देना पड़ता है। इससे तो अच्छा है कि उन्हें एक्जीक्यूटिव बना दो। अफसर बनते ही वह 24 घंटे का मुलाजिम हो जाता है। बिना ओवरटाइम के घंटों बैलों की तरह काम करता है। उसकी स्थिति लगभग बंधुआ मजदूर जैसी होती है। घर पर काम करने वाली बाई अपनी शर्तों पर काम करती है। आप क्या हटाओगे, वह खुद ही काम छोडऩे की धमकी देती है। उसे पता है कि उसके बिना आपका काम नहीं चलने वाला। मोहल्ले की बाइयों में गजब का बहनापा होता है। एक से पंगा लिया मतलब सब से लिया। इसलिए वह छुट्टी मांगती नहीं-मारती है। पैसा काटो तो आंखें तरेरती है। शिक्षा कथित तौर पर लोगों का सशक्तीकरण करती है। पर शिक्षित लोगों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। दरअसल, यह दोष शिक्षा का नहीं बल्कि शिक्षा को व्हाइट कॉलर जॉब से जोड़े जाने का है। खुद ठेला-खोमचा लगाकर दिन में 1000-1500 रुपए कमाए, इसकी बजाय उसे एक ब्रांडेड पट्टा गले में टांगकर 15 हजार की नौकरी करना ज्यादा भाता है। यह ब्रांडेड पट्टा उसकी पहचान होती है-जिसे वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता। इसलिए नगर सैनिक के पदनाम और काम में सामंजस्य नहीं ढूंढना चाहिए। वह सरकारी नौकरी में है, इतना ही काफी है।

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