-दीपक रंजन दास
संत कबीर दास जी ने कहा था-जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार की, पड़ा रहन दो म्यान। अर्थात साधु के ज्ञान और तलवार की धार की ही कीमत होती है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति की शैक्षणिक अर्हता पर सवाल खड़ा कर एक प्रोफेसर ने बेजा हरकत की है। देश की नई शिक्षा नीति भी कहती है कि व्यक्ति के कार्य-अनुभव को भी बराबर का महत्व दिया जाना चाहिए। देश के राष्ट्रपति सभी विश्वविद्यालयों के कुलाध्यक्ष होते हैं। सभी राज्यपाल अपने प्रदेश के विश्वविद्यालयों के पदेन कुलाधिपति होते हैं। जब इनकी शैक्षणिक योग्यता तय नहीं है तो कुलपति का भी क्यों होना चाहिए। एक वरिष्ठ प्रोफेसर द्वारा अपने ही विश्वविद्यालय के कुलपति की योग्यता को चुनौती देना ही इस बात का अपने आप में सबूत है कि कुछ लोग केवल डिग्रियों के भरोसे हर पद हासिल करना चाहते हैं। नोबेल पुरस्कार जीतने वाले गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर ने स्नातक की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी थी। देश के अधिकांश नामचीन पत्रकारों के पास पत्रकारिता की कोई डिग्री नहीं थी। प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार खुशवंत सिंह ने अपनी अधिकांश शिक्षा तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। वे एक विधि स्नातक थे। माखनलाल चतुर्वेदी ने अधिकांश शिक्षा घर पर ही प्राप्त की थी। प्रख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद जब शिक्षक बने तो केवल मैट्रिक पास थे। बाद में उन्होंने कई भाषाओं में बीए किया। नवभारत रायपुर के प्रथम सम्पादक एवं देशबंधु पत्रसमूह के संस्थापक संपादक मायाराम सुरजन भी मुश्किल से स्नातक की शिक्षा तक पहुंचे थे। नवभारत के प्रबंध संपादक बबन प्रसाद मिश्र भी स्नातक ही थे। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और पंजाबी में समान दखल रखने वाले पत्रकार रमेश नैय्यर भी करियर के आरंभ में स्नातक ही थे। रायपुर में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने दो विषयों में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। जाहिर है कि सफलता का उच्च शिक्षा से सीधा संबंध नहीं है। यही बात उन लुहारों के लिए भी कही जा सकती है जिन्होंने सारनाथ का स्तंभ बनाया। उन दिनों मेटलर्जी की पढ़ाई नहीं होती थी। यही बात ताजमहल बनाने वाले वास्तुकारों के बारे में कही जा सकती है जिनके पास आर्किटेक्चर की डिग्री नहीं थी। कुछ लोग स्कूल कालेज जाकर भी नहीं सीख पाते और कोई अपने अनुभवों से ही सीखता चला जाता है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति के पास भले ही उच्च शैक्षणिक योग्यता न हो पर उन्होंने लगभग चार दशक तक देश के प्रमुख अखबारों में संपादकीय दायित्वों का निर्वहन किया है। वे नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन रहे हैं। पत्रकारों और पत्रकारिता की पढ़ाई को दिशा देने में वे किसी भी डिग्री प्राप्त पत्रकार से अधिक समर्थ हैं। विश्वविद्यालय में वैसे भी सर्वोच्च प्रशासकीय पद कुलसचिव का होता है। कुलपति की भूमिका केवल एक मार्गदर्शक की होती है। इसके लिए डिग्री से कहीं ज्यादा जरूरी उसका निजी अनुभव होता है।





