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डस्टबिन से उद्योग तक – अंजना उरांव की आत्मनिर्भरता की उड़ान

By Poonam Patel Published February 2, 2026
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डस्टबिन से उद्योग तक- अंजना उरांव की आत्मनिर्भरता की उड़ान
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रायपुर। कभी-कभी जीवन की दिशा बदलने के लिए किसी बड़े मंच, बड़े अवसर या बड़े संसाधन की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी एक डस्टबिन में पड़ा काग़ज़ का टुकड़ा भी जीवन की करवट बदल देता है। कोरिया जिले के बैकुंठपुर विकासखण्ड के ग्राम तोलगा की अंजना उरांव की कहानी इसी सच्चाई को सशक्त रूप से सामने रखती है, जो कड़ी मेहनत और लगन से ही स्थायी सफलता हासिल की।

अंजना उरांव कोई उद्योगपति परिवार से नहीं आतीं, न ही उनके पास पूंजी, सिफ़ारिश या विशेष प्रशिक्षण था। वे जनपद पंचायत खड़गवां में एक अंशकालिक डाटा एंट्री ऑपरेटर हैं। स्नातकोत्तर डिग्री होने के बावजूद मात्र चार हजार रुपये मासिक मानदेय पर कार्यरत हैं। जीवन एक तयशुदा सीमित दायरे में चल रहा था, तभी एक दिन कार्यालय के डस्टबिन में उन्हें एक फटा हुआ पन्ना मिला। उस पन्ने पर लिखा था प्रधानमंत्री सृजन स्वरोजगार योजना वह पन्ना कचरा नहीं था, वह संभावना थी। अंजना ने उसे पढ़ा, समझा और उसी क्षण मन में यह निश्चय किया कि वे सिर्फ़ नौकरी करने वाली नहीं, बल्कि कुछ सृजित करने वाली बनेंगी।

विरोध, संदेह और संघर्ष का दौर

योजना की जानकारी लेने जब उन्होंने जनपद कार्यालय में चर्चा की तो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ मिलीं। किसी ने जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र जाने की सलाह दी, तो किसी ने यह कहकर हतोत्साहित किया कि बैंक और योजनाओं के चक्कर में पड़ना बेवकूफी है। लेकिन अंजना ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक रोचक बात भी बताई कि एक बार मोबाइल व अखबार में जिला कलेक्टर चन्दन त्रिपाठी का बयान आया था कि महिलाएं किसी से कम नहीं है, अपने हिम्मत से आगे बढ़ सकती हैं। यह वाक्य उनके दिमाग बसा था, इसी जुनून ने आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित किया।

अंजना ने जब जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र से जानकारी लेने के बाद जब पोड़ी-बचरा क्षेत्र में फ्लाईऐश ईंट निर्माण इकाई देखी, तो उनके भीतर एक उद्यमिता जन्म लेने लगा। उन्होंने तय किया कि वे भी फ्लाईऐश ईंट उद्योग स्थापित करेंगी।

इसके बाद शुरू हुआ असली संघर्ष

दस्तावेज़ों की लंबी सूची, बैंकों के बार-बार चक्कर, ऋण अस्वीकृतियाँ और सामाजिक दबाव। मायके और ससुराल दोनों ओर से एक ही सलाह मिली यह लफड़ा मत पालो। अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखें कि आप अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं।

अंजना की जुनून के आगे बढ़ने में पति का रहा साथ

ऐसे समय में उनके पति अनिल कुमार उनके सबसे बड़े संबल बना। दसवीं तक पढ़े अनिल कुमार को उद्योग का अनुभव नहीं था, लेकिन मेहनत, खेती और परिवार की जिम्मेदारी निभाने का जज्बा भरपूर था। उन्होंने अंजना के सपने को अपना सपना बना लिया। अंततः बैकुंठपुर स्थित एचडीएफसी बैंक से 30 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ। कटघोरा से मशीनें मंगाई गईं, शेड का निर्माण हुआ, कोरबा से फ्लाईऐश और स्थानीय स्तर से रेत-सीमेंट की व्यवस्था की गई।

सपना बना हकीकत

अगस्त 2025 में इकाई का लोकार्पण हुआ और अक्टूबर 2025 से उत्पादन शुरू हुआ है। आज अंजना उरांव की अंजना इंटरप्राइजेज फ्लाईऐश ब्रिक्स इकाई लगातार उत्पादन कर रही है। अब तक लगभग 80 हजार ईंटों का निर्माण हो चुका है। वे प्रतिमाह 60 हजार रुपये की बैंक किश्त नियमित रूप से जमा कर रही हैं, बिना किसी चूक के। संयुक्त परिवार, खेती, बच्चों की परवरिश और उद्योग, सब कुछ संतुलन के साथ चल रहा है। चार एकड़ भूमि पर धान और गेहूं की खेती भी जारी है। अब ईंटों की मांग बढ़ती जा रही है। जल्द ही वे ईंट रखने की लकड़ी की ट्रॉली (पीढ़ा) खरीदने वाली हैं। उनका लक्ष्य है प्रतिदिन 15 हजार ईंट उत्पादन और प्रतिमाह 6 से 7 लाख रुपये का कारोबार ।

डस्टबिन से मिली पहचान

आज वही परिवार और समाज, जिसने कभी उन्हें रोका था, उनके साहस की सराहना करता है। अंजना उरांव स्वयं कहती हैं, श्लोग जिस डस्टबिन को कचरा समझते हैं, उसी डस्टबिन ने मुझे मेरी पहचान दी। इसलिए जहाँ से भी ज्ञान मिले, उसे अपनाइए। मेहनत, जुनून और लगन से कोई भी बाधा पार की जा सकती है।

सकारात्मक और प्रेरणादायक लोगों के साथ रहें, जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। कलेक्टर चन्दन त्रिपाठी का कहना है कि अंजना उरांव निश्चित ही उन महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं, जो साधनों और संसाधनों के अभाव का हवाला देकर आगे बढ़ने से रुक जाती हैं। सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ लेकर एक सफल उद्यमी बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही अंजना पर गर्व किया जाना चाहिए।

यह एक कहानी नहीं, बल्कि एक संदेश

अंजना उरांव की यह कहानी सिर्फ़ एक महिला उद्यमी की सफलता नहीं है। यह कहानी है सरकारी योजनाओं के सही उपयोग, ग्रामीण महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भर भारत की जमीनी तस्वीर और उस सोच की, जो अवसर को कचरे में भी खोज लेती है। डस्टबिन से उद्योग तक का यह सफ़र बताता है कि सपनों को हकीकत में बदलने के लिए दृढ़ निश्चय, कड़ी मेहनत और अटूट आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है, तभी मजिल को हासिल किया जा सकता है।

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Poonam Patel February 2, 2026
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