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CG Politics: 7 सीटों का रण रोमांचक मोड़ पर! तीसरे चरण की 7 सीटों का विश्लेषण : कड़े मुकाबले में फँसी भाजपा की कई परंपरागत सीटें

By Om Prakash Verma
Published: April 30, 2024
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CG Politics: 7 सीटों का रण रोमांचक मोड़ पर! तीसरे चरण की 7 सीटों का विश्लेषण : कड़े मुकाबले में फँसी भाजपा की कई परंपरागत सीटें
CG Politics: 7 सीटों का रण रोमांचक मोड़ पर! तीसरे चरण की 7 सीटों का विश्लेषण : कड़े मुकाबले में फँसी भाजपा की कई परंपरागत सीटें
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रायपुर (श्रीकंचनपथ न्यूज़)। दो चरणों का मतदान निपटने के बाद अब राजनीतिक दलों का पूरा जोर तीसरे और अंतिम चरण पर है। इसमें बाकी बची 7 सीटों पर मतदान होना है। पहले दौर में राज्य की इकलौती बस्तर सीट पर 19 अप्रैल को वोटिंग हुई थी, जबकि दूसरे दौर में 26 अप्रैल को कांकेर, महासमुंद और राजनांदगांव सीटों पर मतदान सम्पन्न हो चुका है। अब बाकी बची 7 सीटों के लिए राजनीतिक दल जोर आजमाइश कर रहे हैं। इन 7 सीटों पर मुकाबला बेहद रोमांचक होने के आसार है। इनमें से कोरबा को छोड़कर बाकी 6 सीटें रायपुर, सरगुजा, रायगढ़, जांजगीर चाम्पा, बिलासपुर और दुर्ग पर भाजपा का कब्जा है। कांग्रेस इन सीटों को हथियाने के लिए जद्दोजहद करती रही है, लेकिन लम्बे समय से ये सीटें भाजपा का गढ़ बनी हुई हैं। इस बार इनमें से कई सीटों पर कड़े मुकाबले के आसार हैं।

छत्तीसगढ़ में तीसरे चरण का मतदान 7 मई को होना है। पहले दो चरणों के बाद तीसरे चरण के लिए कांग्रेस और भाजपा जोर आजमाइश कर रहे है। तीसरे चरण में जिन सीटों पर मुकाबला होना है, उनमें से ज्यादातर सीटें हाईप्रोफाइल है। इन सीटों पर कई दिग्गजों की किस्मत दाँव पर लगी हुई है। सभी सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। सिर्फ कोरबा सीट में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का उम्मीदवार कुछ मजबूत दिखता है, लेकिन यहां भी टक्कर भाजपा व कांग्रेस के ही बीच है। ऐसे में गोंगपा को मिलने वाले वोट जीत और हार का अंतर पैदा कर सकते हैं। दोनों दलों के लिए यह बड़ी चिंता है और यही कारण भी है कि इस क्षेत्र में प्रचार के लिए बड़े नेताओं को बुलाया जा रहा है।

रायपुर सीट पर कौन भारी?
1996 से भाजपा के कब्जे में रहने वाली रायपुर सीट पर सबकी निगाहें है। यहां भाजपा ने बृजमोहन अग्रवाल तो कांग्रेस ने विकास उपाध्याय को मैदान में उतारा है। बृजमोहन भाजपा के अजेय योद्धा हैं, जबकि विकास उपाध्याय पिछला विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। इस सीट पर इस बार भी भाजपा का पलड़ा भारी दिखता है। बृजमोहन अग्रवाल का प्रभाव न केवल रायपुर अपितु पूरे छत्तीसगढ़ में हैं। इसके अलावा कांग्रेस के ही भीतर यह चर्चा चलती रही है कि पार्टी ने युवा के नाम पर डमी प्रत्याशी उतारा है। हालांकि कांग्रेस प्रत्याशी विकास उपाध्याय अपना पूरा जोर लगा रहे हैं। भाजपा इस सीट को पहले से ही जीता हुआ मानकर चल रही है। यहां कुल 23 लाख 63 हजार 691 मतदाता हैं। 2019 में रायपुर सीट भाजपा के सुनील सोनी ने कांग्रेस के प्रमोद दुबे को करीब साढ़े तीन लाख वोटों से हराकर जीती थी।

दुर्ग में कांटे की टक्कर
दुर्ग लोकसभा सीट का हाल भी कमोबेश रायपुर जैसा ही है। हालांकि 2014 में कांग्रेस ने यहां से ताम्रध्वज साहू को उतारकर जातीय कार्ड खेला था, जिससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। दुर्ग सीट साहू बाहुल्य है। यही कारण है कि कांग्रेस ने यहां से जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के पूर्व अध्यक्ष राजेन्द्र साहू को उतारा है, जबकि भाजपा के निवर्तमान सांसद विजय बघेल एक बार फिर प्रत्याशी है। बघेल कुर्मी समाज से आते हैं, जिनकी तादाद साहू समाज के बाद दूसरे नंबर है। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी कुर्मी समाज से हैं, ऐसे में आशंका है कि कुर्मी समाज विजय और भूपेश बघेल के फेर में बँट सकता है, जबकि साहू समाज एकजुट नजर आ रहा है। यही वजह है कि इस सीट पर कांटे के टक्कर की संभावना जताई जा रही है। यहां कुल 20 लाख 72 हजार 643 मतदाता प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे।

बिलासपुर में स्थानीय-बाहरी प्रमुख मुद्दा
2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा के अरुण साव ने करीब 1 लाख 42 हजार मतों के अंतर से जीता था। साव फिलहाल छत्तीसगढ़ सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं। इस लिहाज से बिलासपुर सीट पर उनकी प्रतिष्ठा सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। इस बार भाजपा ने यहां से तोखन साहू को उतारा है, जो लोरमी क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं। वे भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं। वहीं कांग्रेस ने भिलाई नगर क्षेत्र के विधायक देवेन्द्र यादव को उतारकर यहां सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश की है। क्योंकि देवेन्द्र यादव को भिलाई से लाकर प्रत्याशी बनाया गया है, इसलिए भाजपा के लिए यह एक प्रमुख मुद्दा है। छात्र राजनीति से शुरूआत करने वाले देवेन्द्र यादव ने भिलाई में लगातार दो बार भाजपा के कद्दावर नेता प्रेमप्रकाश पाण्डेय को हराया है। जबकि इससे पहले वे भिलाई के महापौर भी रह चुके हैं। बिलासपुर यादव बाहुल्य क्षेत्र है। यहां 18 लाख 11 हजार 660 मतदाता हैं।

जांजगीर में बराबरी का मुकाबला
जांजगीर चाम्पा लोकसभा सीट उन सीटों में शुमार है, जहां कांग्रेस ने अपने पूर्व मंत्रियों व कद्दावर नेताओं को उतारा है। यहां से पूर्व नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डहरिया कांग्रेस उम्मीदवार हैं। भाजपा ने यहां से एक महिला कमलेश जांगड़े को टिकट दिया है। डहरिया तीन बार विधायक रह चुके हैं, जबकि भाजपा प्रत्याशी कमलेश जांगड़े पहली बार चुनाव लड़ रही हैं। हालांकि उनके पास ग्रामीण राजनीति का खासा अनुभव है। वे दो बार सरपंच रह चुकी हैं। उन्हें सर्वश्रेष्ठ सरपंच का खिताब भी मिला। वर्तमान में जांगड़े जिला भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष हैं। पिछले चुनाव में इस सीट पर भाजपा के गुहाराम अजगले ने 83 हजार से ज्यादा मतों से जीत हासिल की थी। कहा जा रहा है कि जांजगीर चाम्पा सीट पर कड़े मुकाबला हो सकता हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक यहां बराबरी के मुकाबले की संभावना जता रहे हैं। यहां 20 लाख 44 हजार से ज्यादा मतदाता अपना प्रतिनिधि चुनेंगे।

कोरबा में कांग्रेस की साख दाँव पर
कांग्रेस ने 2019 में छत्तीसगढ़ की जिन 2 सीटों पर जीत हासिल की थी, उनमें से एक सीट कोरबा थी। पार्टी ने एक बार फिर अपनी निवर्तमान सांसद ज्योत्सना महंत को मैदान में उतारा है तो भाजपा ने दुर्ग की सांसद रही और पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पाण्डेय पर दाँव चला है। इस सीट को महंत परिवार का गढ़ माना जाता है, लेकिन इस बार कांग्रेस को यहां कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत पर इस बार कांग्रेस की साख बचाने का जिम्मा है। उन्हें सरोज पाण्डेय के रूप में कड़ी चुनौती मिल रही है। 2008 में अस्तित्व में आई कोरबा सीट पर हर बार सांसद बदलते रहे हैं। मतदाताओं का यह मूड़ भी कांग्रेस के लिए बड़ी चिंता है। इस लोकसभा क्षेत्र में कुल 13 लाख 40 हजार 544 मतदाता हैं। पिछली बार ज्योत्सना महंत ने भाजपा की ज्योतिनंद दुबे को 26 हजार से ज्यादा मतों से हराकर जीत हासिल की थी।

सरगुजा में इस बार महामुकाबला
सरगुजा सीट को भाजपा की परंपरागत सीट माना जाता है, लेकिन इस बार यहां बेहद कड़े मुकाबले के आसार हैं। दरअसल, यह सीट जातीय समीकरणों में फंसती दिख रही है। भाजपा ने यहां कुछ समय पहले ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले चिंतामणि महाराज को प्रत्याशी बनाया है तो कांग्रेस ने युवा और तेजतर्रार नेत्री शशि सिंह को मैदान में उतारा है। शशि पूर्व मंत्री तुलेश्वर सिंह की पुत्री है। राहुल गांधी की न्याय यात्रा के दौरान वे चर्चा में आई थी। उन्हें जमीनी स्तर पर काम करना पसंद है। शशि सिंह को टिकट मिलने के बाद कांग्रेस के स्थानीय नेता भी हैरान रह गए थे। माना जा रहा है कि इस सीट पर भाजपा व कांग्रेस के बीच इस बार महामुकाबला होने जा रहा है। 2019 में इस सीट से भाजपा की रेणुका सिंह ने जीत हासिल की थी। उन्हें केन्द्रीयमंत्री भी बनाया गया। सरगुजा में कुल 18 लाख 12 हजार 901 मतदाता हैं। भाजपा को अपनी यह सीट बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

सीएम के क्षेत्र में भाजपा मजबूत
रायगढ़ लोकसभा सीट की बात करें तो इस सीट का आधा हिस्सा बिलासपुर तो आधा सरगुजा में पड़ता है। यहां लगातार 7 चुनाव से भाजपा जीत दर्ज करती आई है। प्रदेश के मुखिया विष्णुदेव साय ने रायगढ़ को भाजपा का गढ़ बनाया। इस बार भी रायगढ़ सीट पर भाजपा की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। भाजपा ने यहां से राधेश्याम राठिया को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस से मेनका देवी सिंह मैदान में हैं। मेनका सिंह राजपरिवार से आती हैं। दोनों प्रत्याशी पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। राठिया विधानसभा चुनाव के लिए कई बार दावेदारी ठोकते रहे, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इसी तरह मेनका सिंह को भी पिछले चुनाव में टिकट मिलते-मिलते रह गई थी। मेनका सिंह पूर्व सांसद पुष्पादेवी की छोटी बहन हैं। तत्कालीन सारंगढ़ रियासत के राजा नरेश चंद्र के परिवार से ताल्लुक रखने वाली मेनका को भाजपा की कड़ी चुनौती से निपटना होगा। क्षेत्र में 18 लाख 29 हजार से ज्यादा मतदाता हैं।

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