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CG Politics: कांग्रेस के लिए अबूझ बन गया रायगढ़! भाजपा का 20 साल पुराना किला ढहा पाएगी कांग्रेस?

By Om Prakash Verma
Published: April 27, 2024
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CG Politics: कांग्रेस के लिए अबूझ बन गया रायगढ़! भाजपा का 20 साल पुराना किला ढहा पाएगी कांग्रेस?
CG Politics: कांग्रेस के लिए अबूझ बन गया रायगढ़! भाजपा का 20 साल पुराना किला ढहा पाएगी कांग्रेस?
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सीएम विष्णुदेव साय के गढ़ में भाजपा जीत के प्रति आश्वस्त, लेकिन कांग्रेस के भी अपने दावे
रायपुर (श्रीकंचनपथ न्यूज़)। छत्तीसगढ़ में दूसरे चरण का मतदान शांतिपूर्वक निपटने के बाद अब तीसरे चरण में 7 सीटों पर 7 मई वोटिंग होनी है। प्रशासनिक स्तर पर इसके लिए तैयारियां की जा रही है तो राजनीतिक दल भी इस अंतिम दौर के मतदान को अपने पक्ष में करने शिद्दत से जुट गए हैं। 7 सीटों पर कुल 168 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। इनमें सबसे ज्यादा 38 प्रत्याशी रायपुर से हैं। वहीं दूसरे स्थान पर बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र है, जहां से 37 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। सरगुजा में 10 तो रायगढ़ में 13 प्रत्याशी मैदान में हैं। वहीं जांजगीर चांपा की बात करें तो यहां कुल 18 उम्मीदवार हैं। कोरबा में 27 तो दुर्ग में 25 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला अंतिम चरण का मतदान करेगा। इन सबके बीच आज हम बात करेंगे रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र की, जहां वोटिंग को लेकर तैयारियां करीब-करीब पूरी की जा चुकी है। इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी राधेश्याम राठिया का मुकाबला कांग्रेस की मेनका देवी सिंह से होगा।
छत्तीसगढ़ के 11 लोकसभा सीटों में रायगढ़ लोकसभा सीट को काफी अहम माना जाता है। इस सीट का आधा हिस्सा बिलासपुर तो आधा हिस्सा सरगुजा में पड़ता है। इस क्षेत्र में कुल 8 विधानसभा सीटें हैं। पिछले 5 चुनाव यहां से भाजपा लगातार जीतती आई है। जीत को लेकर इस बार भी भाजपा आश्वस्त दिखती है। हालांकि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गढ़ रहे रायगढ़ में कांग्रेस ने भी मेनका सिंह के रूप में दिग्गज प्रत्याशी को उतारकर मुकाबले को रोचक बना दिया है। इस सीट पर साल 1999 से लेकर 2019 तक भाजपा का कब्जा रहा है। लगातार पांच बार से रायगढ़ लोकसभा सीट पर चुनाव में भाजपा जीत दर्ज करती आ रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां की सांसद गोमती साय को पत्थलगाँव से टिकट दी थी। जीत के बाद उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया था। रायगढ़ लोकसभा सीट पर 7 बार भाजपा, 6 बार कांग्रेस, 1 बार निर्दलीय और एक बार दूसरी पार्टी ने जीत का स्वाद चखा है। साल 2009 में रायगढ़ लोकसभा सीट में कुल 14,32,746 मतदाता थे, इनमें 935746 वोटरों ने मतदान किया था। इस सीट से भाजपा से विष्णु देव साय ने कुल 4,43,948 वोटों से जीत दर्ज की थी। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या 1626949 थी, इनमें 1217706 वोटरों ने मतदान किया था। इस सीट पर बीजेपी से विष्णुदेव साय ने कुल 6,62,478 वोटों से जीत हासिल की थी। बात अगर साल साल 2019 के लोकसभा चुनाव की करें तो इस साल रायगढ़ क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या 1733805 थी। इनमें 1334395 वोटरों ने मतदान किया। इस सीट से भाजपा प्रत्याशी गोमती साय ने 6,58,335 वोटों से जीत हासिल की थी।

भाजपा का सबसे मजबूत किला
रायगढ़ सीट छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से ही भाजपा के लिए अपराजेय है। भले ही कांग्रेस ने यहां से मेनका देवी सिंह के रूप में मजबूत प्रत्याशी उतारा हो, लेकिन भाजपा रायगढ़ को छत्तीसगढ़ में अपना सबसे मजबूत किला मानती है। जबकि कांग्रेस इस सीट पर से अपना 25 साल पुराना बनवास खत्म करने की जद्दोजहद कर रही है। रायगढ़ लोकसभा सीट पर आजादी के बाद से 15 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। इन चुनावों में 7 बार भाजपा तो छह बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है। एक बार निर्दलीय और एक बार दूसरी पार्टी के प्रत्याशी जीते हैं। रायगढ़ लोकसभा सीट छत्तीसगढ़ की सबसे अहम सीट मानी जाती है। इसमें शामिल 8 विधानसभा क्षेत्र बिलासपुर और सरगुजा संभाग से आते हैं। इस लिहाज से मतदाताओं की मानसिकता क्षेत्र के आधार पर विभाजित दिखती है। संभवत: इस सीट पर कांग्रेस के संघर्ष की वजह भी यही है। हालांकि इस सीट को भाजपा का मजबूत किला बनाने में सबसे अहम् भूमिका विष्णुदेव साय की रही है, जो वर्तमान में राज्य के मुखिया हैं। ऐसे में कांग्रेस की मुश्किलें यहां कम होती नहीं दिखती है।

कांग्रेस-भाजपा में बराबरी की टक्कर
रायगढ़ लोकसभा अंतर्गत आने वाली 8 विधानसभा सीटों में जशपुर के तीन, रायगढ़ की चार और सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले की सारंगढ़ विधानसभा सीट शामिल है। इसमें जशपुर की तीनों सीटों पर तो विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीत हासिल की थी। वहीं रायगढ़ जिले के तीन विधानसभा में उसे हार का सामना करना पड़ा। ये सीटें कांग्रेस के पास है। इसमें धरमजयगढ़, लैलूंगा और खरसिया शामिल है। रायगढ़ लोकसभा सीट में ग्रामीण आबादी का प्रतिशत 85.79 है। कुल आबादी में आदिवासियों का हिस्सा 44 फीसदी है जबकि अनुसूचित जाति की आबादी 11.70 फीसदी है। हालांकि यह भी निर्विवाद रूप से सत्य है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मुद्दे अलग-अलग होते हैं और मतदाता इसी आधार पर वोटिंग भी करते हैं। इसलिए विधानसभा चुनाव से तुलना की अपेक्षा यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भाजपा इस सीट पर लगातार 5 बार से जीत दर्ज कर रही है। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले यानी 1999 से 2019 तक के पिछले चुनाव तक भाजपा को यहां कभी मात नहीं मिली। भाजपा इस सीट पर अपनी जीत को लेकर पूर्णत: आश्वस्त है।

यह है मजबूत और कमजोर पक्ष
रायगढ़ लोकसभा सीट की बात करें तो रायगढ़ जिला आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। जिले में राठिया समाज की बाहुलता है। इसमें धरमजयगढ़, लैलूंगा और खरसिया में राठिया समाज के लोग अधिक हैं। धरमजयगढ़, लैलूंगा और खरसिया तीनों विधानसभा सीट कांग्रेस के पास है। इन सीटों पर राठिया समाज की बाहुलता होने से जातीय समीकरण के अनुसार भाजपा मजबूत मानी जा रही है। इसके साथ ही भाजपा केंद्रीय योजनाओं के साथ ही मोदी की गारंटी को लेकर मतदाताओं तक पहुंच रही है। लेकिन यहां भाजपा के लिए कुछ दिक्कतें भी है। पार्टी मोदी की गारंटी और मोदी फेस के भरोसे है। क्षेत्र में राठिया समाज की बाहुलता है, लेकिन सभी सीटों पर नहीं है। इस लोकसभा सीट की 8 में से तीन सीटों पर ही भाजपा जीत दर्ज कर पाई थी। वहीं कांग्रेस के मजबूत पक्ष की बात करें तो मेनका सिंह का परिवार और बहनें राजनीति से जुड़े हुए है। यहां सारंगढ़ राजपरिवार का प्रभाव रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यहां की 8 सीटों में से तीन पर कब्जा किया। आदिवासी व अन्य समुदायों में मेनका परिवार की अच्छी पैठ है। भूपेश सरकार का कामकाज भी यहां मुद्दा है। कांग्रेस के कक्ष पक्ष को देखें तो राठिया समाज की बाहुल्यता और भाजपा द्वारा राठिया समाज से प्रत्याशी बनाया जाना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है। इस समाज के वोटों को कांग्रेस कैसे साधेगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। वहीं कांग्रेस के मुद्दे भी यहां प्रभावहीन दिखते हैं।

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