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CG Politics: कांकेर लोकसभा : अपराजेय भाजपा बनी कांग्रेस का सिरदर्द, एससी आरक्षित सीट में 1998 के बाद से कांग्रेस को जीत की तलाश

By Om Prakash Verma
Published: February 24, 2024
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CG Politics: कांकेर लोकसभा : अपराजेय भाजपा बनी कांग्रेस का सिरदर्द, एससी आरक्षित सीट में 1998 के बाद से कांग्रेस को जीत की तलाश
CG Politics: कांकेर लोकसभा : अपराजेय भाजपा बनी कांग्रेस का सिरदर्द, एससी आरक्षित सीट में 1998 के बाद से कांग्रेस को जीत की तलाश
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रायपुर (श्रीकंचनपथ न्यूज़)। छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने राज्य की जिन 5 सीटों पर अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद जताई है, उनमें से एक कांकेर लोकसभा भी है। मजे की बात है कि इस सीट पर 1998 के बाद से कांग्रेस को जीत की तलाश है। बावजूद इसके विधानसभा चुनाव नतीजों के आधार पर पार्टी के नेता इस बार कांकेर फतह का ख्वाब देख रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि राज्य और केन्द्र के चुनाव अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण 2018 का चुनाव है, जब प्रदेश में कांग्रेस ने अभूतपूर्व बहुमत के साथ सरकार बनाई, लेकिन अगले ही साल हुए लोकसभा के चुनाव में उसे 11 में से महज 2 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। इस बार प्रदेश में भाजपा की सरकार है तो यह पार्टी सभी 11 सीटें जीतने की आस पाल रही है। गुरूवार को जब गृहमंत्री अमित शाह कोंडागांव आए तो उन्होंने बस्तर और महासमुंद के साथ ही कांकेर लोकसभा क्षेत्र के हालातों की भी समीक्षा की।

कभी बस्तर लोकसभा का हिस्सा रही कांकेर सीट 1967 में अस्तित्व में आई। अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षित इस सीट में बालोद, धमतरी और बस्तर की कुल 8 विधानसभा सीटें आती है। इनमें संजारी बालोद, डौंडीलोहारा, गुंडरदेही, सिहावा के साथ ही अंतागढ़, भानुप्रतापपुर, कांकेर और केशकाल शामिल है। गुंडरदेही और संजारी बालोद को छोड़ दें तो बाकी सभी विधानसभा सीटें एससी आरक्षित है। हालिया सम्पन्न विधानसभा चुनाव में इन 8 सीटों में से कांग्रेस को 5 तो भाजपा को 3 सीटें मिली थी। संभवत: यही कारण है कि प्रदेश कांग्रेस को कांकेर में अपने लिए संभावनाएं नजर आ रही है। राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने पखवाड़ेभर पहले ही इस संसदीय क्षेत्र के केन्द्रीय कार्यालय का शुभारम्भ किया था। चुनाव तारीखों का ऐलान अगले महीने होना है। इससे काफी पहले ही चुनाव कार्यालय खोलना, चुनाव को लेकर भाजपा की गम्भीरता को दिखाता है। इस लोकसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा बार जीत का रिकार्ड कांग्रेस के नेता रहे अरविंद नेताम के नाम है। उन्होंने यहां से 5 बार लोकसभा चुनाव जीता। एक बार उनकी पत्नी भी सांसद रही। नेताम इंदिरा गांधी और नरसिम्हा राव सरकार में मंत्री भी रहे। इसके बाद लगातार 4 जीत का रिकार्ड भाजपा के सोहन पोटाई के नाम रहा, जिन्होंने 1998 के बाद 2009 तक लगातार 4 चुनाव में जीत दर्ज की। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जिस अरविंद नेताम ने 5 बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, उसे आगे चलकर कांग्रेस ने विस्मृत कर दिया। कमोबेश ऐसा ही कांकेर को भाजपा का गढ़ बनाने वाले सोहन पोटाई के साथ भी हुआ। हालांकि अब दोनों नेता दिवंगत हैं।

पहला सांसद जनसंघ से…
बस्तर से अलग होकर अस्तित्व में आए कांकेर लोकसभा क्षेत्र में 1967 में पहला संसदीय चुनाव हुआ, जिसमें जनसंघ के त्रिलोक शाह लाल प्रियेन्द्र शाह ने जीत हासिल की। हालांकि यह जीत लम्बी नहीं चल पाई। 1971 के चुनाव में कांग्रेस के अरविंद नेताम यहां से पहली बार सांसद निर्वाचित हुए। केन्द्र में इंदिरा गांधी के शासन के दौरान पूरे देश में इसी दौरान इमरजेंसी लगी, जिसके चलते अगला लोकसभा चुनाव 1977 में हुआ। इमरजेंसी का नतीजा भी कांग्रेस को भोगना पड़ा। तब कांकेर सीट से जनता पार्टी के अघन सिंह ठाकुर निर्वाचित हुए। उन्होंने उन्हीं अरविंद नेताम को हराया जो इससे पहले सांसद थे। इसके बाद 1980, 1984, 1989 और 1991 के 4 चुनाव में लगातार अरविंद नेताम ने जीत का परचम लहराकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का भरोसा कायम रखा। 1996 में कांग्रेस ने नेताम का नाम हवाला कांड में आने की वजह से कांग्रेस ने उनकी पत्नी छबीला नेताम को प्रत्याशी बनाया तब भी मतदाताओं ने कांग्रेस को निराश नहीं किया। लेकिन यही चुनाव कांग्रेस के अंतिम भी साबित हुआ, क्योंकि उसके बाद से आज तक कांग्रेस इस सीट पर जीत के लिए तरस रही है।

सोहन पोटाई ने बनाया भाजपा का गढ़
कांकेर को भाजपा का गढ़ बनाने में तत्कालीन युवा नेता और संघ के पुराने कार्यकर्ता रहे सोहन पोटाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भाजपा ने जब 1998 में उन्हें प्रत्याशी बनाया तो इस सीट से पार्टी की जीत का जो खाता खुला, वह अब तक जारी है। पोटाई 1998, 1999, 2004 और 2009 के चुनाव में लगातार 4 बार जीते। लेकिन 2014 में पार्टी ने उनकी जगह विक्रम उसेंडी को उतार दिया। उसेंडी ने हालांकि पार्टी को निराश नहीं किया। यह वह वक्त था जब प्रदेश में डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में भाजपा तीसरी बार सरकार बना चुकी थी। उसेंडी की जीत के बाद पोटाई की नाराजगी बढ़ती चली गई। यह नाराजगी इतना बढ़ी कि 2016 में भाजपा ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निकाल बाहर किया। तब तक कांग्रेस के सीनियर नेता अरविंद नेताम की भी कांग्रेस में पूछपरख कम हो चुकी थी। कुछ समय बाद बाद पोटाई और नेताम ने मिलकर आदिवासी हितों की रक्षा के लिए हाथ मिला लिया। दोनों सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले काम करते रहे। आगे चलकर नेताम ने राजनीतिक पार्टी भी बनाई।

शाह ने फूंका चुनावी बिगूल
गुरूवार को बस्तर के कोंडागांव पहुंचे भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार अमित शाह ने बस्तर क्लस्टर के तीनों लोकसभा क्षेत्रों कांकेर, महासमुंद व बस्तर की महत्वपूर्ण बैठक लेकर चुनावी बिगूल फूंक दिया। उन्होंने निर्वाचन की सबसे छोटी इकाई बूथ स्तर पर काम करने पर जोर देते हुए आह्वान किया कि कार्यकर्ता पार्टी की विचारधारा को जन जन तक पहुंचने में जुट जाएं। इसी से जीत के लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे। केन्द्रीय नेतृत्व के साथ ही प्रदेश भाजपा ने भी इस बार राज्य की सभी 11 संसदीय सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है, इसलिए एक-एक सीट की अपनी अहमियत है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि कांकेर सीट पर उसके लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होगी। पार्टी की चिंता में फिलहाल बस्तर है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा था। वर्तमान में कांग्रेस के दीपक बैज बस्तर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वे पीसीसी के अध्यक्ष भी हैं। यही वजह है कि बस्तर क्षेत्र के कोंडागांव क्षेत्र से ही केन्द्रीय रणनीतिकार अमित शाह ने चुनावी बिगूल फूंका। कांग्रेस भी बस्तर सीट को लेकर आश्वस्त नजर आती है।

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