दुर्ग। जिन आदिवासी (एसटी) वोटों की बदौलत भाजपा छत्तीसगढ़ में सत्ता का स्वाद चखती रही, उसी वर्ग ने पिछले विधानसभा चुनाव में उसे सत्ता से बेदखल करने में अहम् भूमिका निभाई। भाजपा ने यदि चिंतन शिविर के जरिए सत्ता की चाबी फिर से तलाशने की कोशिश की है तो उसी आदिवासी क्षेत्र बस्तर को ध्यान में रखकर। बस्तर चिंतन का निचोड यह निकला है कि भाजपा को अपने परंपरागत वोटर्स को फिर से सहेजना होगा। इसके लिए पार्टी ने सोशल इंजीनियरिंग की राह पकड़ी है। अगले दो साल तक भाजपा आदिवासी (एसटी) और साहू-कुर्मी (ओबीसी) की राजनीति करती नजर आए तो आश्चर्य नहीं होगा। इनमें से साहू समाज अब भी भाजपा के साथ है, जबकि आदिवासी और कुर्मी छिटक गए हैं।

छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों में से 39 सीटें एससी-एसटी के लिए आरक्षित हैं। जबकि शेष 51 सीटें सामान्य वर्ग के लिए हैं। इनमें से भी 11 सीटों पर एससी वर्ग का प्रभाव माना जाता है। शायद यही वजह है कि सामान्य सीटों पर भी दीगर समाज को महत्व मिलता रहा है। कुल 29 सीटें एसटी और 10 सीटें एससी वर्ग के लिए हैं। जातिगत समीकरणों पर फोकस करें तो राज्य की आधी से ज्यादा सीटों पर पिछड़ा वर्ग का दबदबा है। राज्य की करीब 47 फीसदी आबादी भी पिछड़ा वर्ग से ही है। शायद यही वजह है कि भाजपा को यह चिंतन करना पड़ गया कि उसे एसटी और पिछड़ा वर्ग के वोटों को सकेलने के लिए क्या और कैसे करना है। आमतौर पर राजनीतिक दलों को सोशल इंजीनियरिंग की याद तब आती है जब चुनाव करीब होते हैं, किन्तु भाजपा अगले विधानसभा चुनाव को लेकर कितनी गम्भीर है, इसका अंदाजा इसी से हो जाता है कि वह ढाई साल पहले ही मिशन मोड में आ गई है।
संगठन में भी रहेगा दबदबा
भाजपा संगठन में आने वाले दिनों में एसटी और ओबीसी का प्रभाव देखने को मिल सकता है। बस्तर चिंतन बैठक में इस पर विशेष तौर पर •ाोर दिया गया था। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने तो बाकायदा इस विषय पर एक पूरा सत्र लिया था। पार्टी में इस बात को लेकर एकराय है कि ओबीसी का एक बड़ा धड़ा (साहू समाज) अब भी पार्टी के साथ है, किन्तु भूपेश बघेल के ज्यादा प्रभावशाली होने और भाजपा के बड़े कुर्मी चेहरे रमेश बैस के सक्रिय राजनीति से दूर होने की वजह से कुर्मी समाज छिटक गया है। हालांकि फिलहाल पार्टी का पूरा •ाोर एसटी याने आदिवासियों को फिर से भाजपाई धारा में लाने पर है। इस वर्ग का प्रभाव बस्तर और सरगुजा में है। पार्टी इसी वर्ग के जरिए सत्ता की कुंजी तलाश रही है। गौरतलब है कि प्रदेश की राजनीति के शीर्ष पर लम्बे समय तक डॉ. रमन सिंह बने रहे, जो सामान्य वर्ग थे। किन्तु अब सत्ता का गणित, जातीय समीकरणों की वजह से बदलता दिख रहा है।
नए नेतृत्व के जरिए मिलेगी चुनौती
राज्य में एससी-एसटी से ज्यादा ओबीसी हैं। इस वर्ग का कुल अनुपात करीब 47 है। पिछले विधानसभा चुनाव में इस वर्ग के सबसे बड़े चेहरे के रूप में स्वयं तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और ताम्रध्वज साहू थे। कुर्मी-साहू की इसी जुगलबंदी की बदौलत कांग्रेस, भाजपाई वोट-बैंक पर सेंध लगाने में कामयाब हुई थी। अब भी बघेल-साहू की यह जोड़ी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि भाजपा के पास इन दोनों दिग्गज नेताओं का विकल्प नहीं है। पार्टी को नया नेतृत्व सामने लाना होगा, जिसकी कार्यप्रणाली वक्त और हालातों पर निर्भर करेगी। ऐसे में भाजपा के लिए चुनौतियां कम नहीं है। ओबीसी में ही 95 से ज्यादा जातियां हैं। इनमें 12 फीसदी साहू हैं तो करीब 5 फीसदी कुर्मी। 9 फीसदी यादव मतदाता भी इसी वर्ग से हैं। दरअसल, 2008 के परिसीमन के बाद छत्तीसगढ़ में ओबीसी वर्ग का दबदबा एकदम से बढ़ गया था। इसके बाद इस वर्ग के विधायक भी ज्यादा संख्या में विधानसभा में पहुंचे।
सरगुजा-बस्तर पर दारोमदार
छत्तीसगढ़ में एसटी वर्ग की एक पूरी पट्टी से भाजपा साफ हो चुकी है। इस वर्ग का सर्वाधिक प्रभाव सरगुजा और बस्तर संभाग में है। सरगुजा में विधानसभा की कुल 14 सीटें हैं, जबकि बस्तर में 12। चौंकाने वाली बात यह है कि इन सभी सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। बस्तर में 2018 में पार्टी को महज 1 सीट भीमा मंडावी के रूप में मिली थी, किन्तु उनकी हत्या के बाद हुए उपचुनाव में यह सीट भी कांग्रेस के खाते में चली गई। भाजपा के पास बस्तर में जितने भी चेहरे थे, सभी को बुरी तरह पराजय झेलनी पड़ी। ऐसे में यदि पार्टी ने चिंतन शिविर का आयोजन राजधानी रायपुर से हटकर बस्तर में किया तो इसके मायने समझे जा सकते हैं। वहीं सरगुजा संभाग पर पार पाना भी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। इस पूरे इलाके में कांग्रेस के कद्दावर नेता टीएस सिंहदेव का खासा जनाधार और प्रभाव है। हालांकि भाजपा के पास यहां बड़े आदिवासी चेहरे के रूप में राज्यसभा सांसद रामविचार नेताम मौजूद हैं। वहीं बस्तर में लम्बे समय से अपेक्षित नंदकुमार साय भी हैं। इन दोनों नेताओं के कंधों पर आदिवासी वोट कबाडऩे की जिम्मेदारी होगी। पार्टी नेताओं का मानना है कि भाजपा को शहरों में जो सीटें मिलती है, उसके जरिए सत्ता में आना संभव नहीं है, इसलिए सरगुजा और बस्तर पर फोकस करना जरूरी है। यदि इन दो प्रमुख इलाकों में पार्टी चिंतन शिविर के निष्कर्ष के आधार पर अपना प्रभाव स्थापित कर पाती है, तो कांग्रेसी चक्रव्यूह तोडऩे में सफल रहेगी।




