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पर्यावरण संरक्षण में भारतीय महिलाओं का योगदान, चिपको आंदोलन में निभाई अहम भूमिका

By @dmin Published June 5, 2022
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5 जून को हर साल विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत पकृति संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से हुई थी। भारत में भी पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोगों की आवाज दशकों पहले उठी, जब पेड़ों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई। चिपको आंदोलन को 49 साल हो चुके हैं। भारत की महिलाएं जो देश की आजादी के लिए जान गंवाने से भी पीछे नहीं हटीं, उन्हीं महिलाओं ने आजाद भारत के बिगड़े पर्यावरण को बचाने, प्रकृति की रक्षा के लिए चिपको आंदोलन को एक ईको-फेमिनिस्ट आंदोलन का रूप दिया। इस आंदोलन का पूरा ताना-बाना महिलाओं ने ही बुना था। चिपको आंदोलन में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उनकी सक्रियता और भागीदारी के कारण उस दौर में सकारात्मक असर देखने को मिला। कुछ शब्दों में कहें तो चिपको आंदोलन का नेतृत्व महिलाओं ने किया था, ये कहना गलत नहीं होगा। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर जानिए भारत में उत्तराखंड में साल 1973 में शुरु हुए चिपको आंदोलन में महिलाओं की भूमिका के बारे में।

Contents
कब और कैसे हुई चिपको आंदोलन की शुरुआतचिपको आंदोलन की जननीचिपको आंदोलन में शामिल महिलाएं

कब और कैसे हुई चिपको आंदोलन की शुरुआत

चिपको आंदोलन जंगलों और पेड़ों की कटाई से जुड़ा है। इसकी पृष्ठभूमि उत्तराखंड की है, जहां के वनों की सुरक्षा के लिए 1970 के दशक में लोगों ने आंदोलन शुरू किया इस दौरान लोग पेड़ों को गले लगाकर उन्हें कटने से बचाया करते थे। इसे मानक और प्रकृति के बीच के प्रेम का प्रतीक मानते हुए चिपको आंदोलन नाम दिया गया। 26 मार्च 1974 को उत्तराखंड के चमोली जिले में ढाई हजार पेड़ों की नीलामी के बाद ठेकेदार ने मजदूरों को पेड़ काटने के लिए जंगल में भेजा लेकिन उनका सामना रैणी गांव की महिलाओं से हुआ, जो कटाई रोकने के लिए पेड़ों से चिपक गईं। उन्होंने कहा कि पेड़ों का काटने से पहले उन्हें काटा जाएं। उनकी इस निडरता की गूंज पूरे भारत में सुनाई दी।

चिपको आंदोलन की जननी

रैणी गांव से शुरू हुए चिपको आंदोलन का नेतृत्व करने वाली एक महिला थीं, जिनका नाम गौरा देवी था। गौरा देवी को चिपको आंदोलन में शामिल होने वाली पहली महिला माना जाता है, जिन्होंने 27 महिलाओं का नेतृत्व कर मजदूरों को पेड़ काटने से रोका था।

इसी तरह राजस्थान में चिपको आंदोलन का नेतृत्व करने वाली एक महिला थीं। सामाजिक कार्यकर्ता वंदना शिवा की किताब ‘स्टेइंग अलाइव: वीमेन इकोलॉजी एंड सर्वाइवल इन इंडियाÓ में चिपको आंदोलन का जिक्र है, जिसमें लिखा गया है कि राजस्थान में बिश्नोई समुदाय के तीन सौ से ज्यादा लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। राजस्थान में अमृता देवी नाम की महिला ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए चिपको आंदोलन का नेतृत्व किया था।

चिपको आंदोलन में शामिल महिलाएं

भले ही चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा जैसे लोगों ने चिपको आंदोलन में मुख्य और सक्रिय भूमिका निभाई हो लेकिन देश की महिलाओं ने इस आंदोलन की जमीन तैयार की। इस आंदोलन का सफल बनाया। चिपको आंदोलन में उत्तराखंड की गौरा देवी और राजस्थान की अमृता देवी के अलावा कई अन्य महिलाओं का भी योगदान हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। इनमें गांधी जी की शिष्या मीरा बेन, सरला बेन, बिमला बेन, हिमा देवी, गंगा देवी, बचना देवी, इतवारी देवी, छमुन देवी का नाम शामिल है।

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