भिलाई। प्रदेश कांग्रेस में एक के बाद एक लगातार बढ़ रही अनुशासनहीनता की घटनाओं ने पार्टी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। पहले अंबिकापुर और फिर रायपुर में ऐसी घटनाएं हुईं हैं, जिसके बाद सवाल उठने लाजिमी है। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी में जिस तरह सिर फुटौव्वल हुई, उसे पार्टी का आंतरिक मामला बताया गया। उसके अगले दिन भवन सन्निर्माण कर्मकार मंडल के अध्यक्ष सन्नी अग्रवाल और प्रदेश कांग्रेस महामंत्री अमरजीत चावला के बीच हुए विवाद के बाद सन्नी अग्रवाल का निलंबन को घोर अनुशासनहीनता कहा गया। यह इंगित कर रहा है कि अनुशासनहीनों पर कार्रवाई में स्पष्टता का अभाव है। राज्य की सत्ता के लिए पार्टी के भीतर अब भी उठापटक चल रही है। टीएस सिंहदेव लम्बे समय से दिल्ली में धूनी रमाए हैं तो इधर, छत्तीसगढ़ में पार्टी आगामी चुनाव की तैयारियों को मूर्त रूप दे रही है। सदस्यता अभियान भी शुरू होने को है। इन सबके बीच आंतरिक अनुशासन का अभाव खतरे की घंटी बजा रहा है।

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अनुशासनहीनता पार्टी का सिरदर्द बढ़ा रही है। हफ्तेभर के भीतर तीन ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो कांग्रेस के आंतरिक अनुशासन की पोल खोलती है। हालांकि सन्नी अग्रवाल के जरिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कड़ा संदेश देने का प्रयास किया है, किन्तु दो अन्य घटनाओं पर कोई कार्यवाही नहीं करने को लेकर पार्टी के ही भीतर असंतोष उभरने लगा है। पिछले दिनों जशपुर में कांग्रेस कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान पूर्व जिलाध्यक्ष पवन अग्रवाल को बोलने से रोक दिया गया था। न केवल माइक छीना गया बल्कि उन्हें मंच से धक्के देकर उतार दिया गया। पवन अग्रवाल को स्वास्थ्यमंत्री टीएस सिंहदेव का समर्थक माना जाता है। सम्मेलन के दौरान अग्रवाल ने ढाई-ढाई साल वाले फार्मूले के लेकर सीएम भूपेश बघेल से सीट छोडऩे की मांग की थी। जाहिर है कि यह पार्टी फोरम का मामला था और सार्वजनिक तौर पर इसे उठाना जाना अनुशासनहीनता की परिधि में आता है। किन्तु उन पर अनुशासन की कार्रवाई करने के बजाए जिस तरह से बेइज्जत करने की कोशिश हुई, वह उससे भी बड़ी अनुशासनहीनता थी। राज्य में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच लम्बे समय से मुख्यमंत्री पद को लेकर घमासान मचा हुई है। बावजूद इस दोनों नेताओं ने कभी भी सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी नहीं की। हालांकि यह विवाद दिल्ली दरबार तक भी पहुंचा। दोनों नेताओं की हाईकमान के सामने पेशी भी हुई, परंतु कोई नतीजा नहीं निकल पाया। टीएस बाबा अब भी दिल्ली में डेरा डाले बैठे हैं और हाईकमान से मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
छात्र संगठन में वर्चस्व की लड़ाई
छात्र संगठन एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने शुक्रवार को जमकर बवाल काटा। राष्ट्रीय अध्यक्ष नीरज कुंदन की मौजूदगी में हुए इस हंगामे को बड़े परिवार की छोटी-मोटी नोंक-झोंक बता दिया गया। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय राजीव भवन में दो गुटों के बीच हुए इस विवाद और मारपीट के घटनाक्रम का पटाक्षेप वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप के बाद हुआ। दरअसल, नीरज कुंदन के स्वागत के लिए प्रदेशभर के कार्यकर्ता कांग्रेस भवन में पहुंचे थे। कुंदन के पहुंचते ही उनके स्वागत के लिए कार्यकर्ताओं में होड़ मच गई। इसी दौरान दो गुटों के कार्यकर्ता आपस में उलझ पड़े। मामला इतना गरमाया कि गाली-गलौज और मारपीट की नौबत आ गई। कई लोगों ने बीच-बचाव का प्रयास किया, किन्तु उग्र भीड़ में सुनने वाला कोई नहीं था। करीब 45 मिनट तक चले इस विवाद का किसी तरह पटाक्षेप कराया गया। एनएसयूआई कांग्रेस का छात्र संगठन है और इसे राजनीति की पहली पाठशाला कहा जाता है। यहीं से पार्टी अनुशासन की बुनियाद पड़ती है। लेकिन इतने बड़े मामले को पार्टी के सीनियर नेताओं ने बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी। आपस में उलझने वाले दोनों गुटों से न सवाल-जवाब हुए, न किसी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। खुद एनएसयूआई के अध्यक्ष नीरज कुंदन ने इसे पारिवारिक मामला बता दिया।
सन्नी के निलंबन पर सवाल
एनएसयूआई कार्यकर्ताओं के बीच हुए सिर फुटौव्वल के अगले ही दिन उसी कांग्रेस मुख्यालय में एक और बड़ा विवाद हो गया। यहां प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकान को सदस्यता अभियान पर चर्चा के लिए पहुंचना था। इसी दौरान छत्तीसगढ़ भवन एवं सन्निर्माण कर्मकार मंडल के अध्यक्ष सन्नी अग्रवाल और प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री अमरजीत चावला के बीच तू-तू मैं-मैं हो गई। बात गाली-गलौज और हाथा-पाई तक भी पहुंची। पूरा विवाद गाड़ी खड़ी करने को लेकर उपजा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मरकाम ने इसे गम्भीर अनुशासनहीनता मानते हुए सन्नी अग्रवाल को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया। आदेश जारी होने के बाद अब अग्रवाल पर मंडल अध्यक्ष का पद छोडऩे का खतरा भी मंडराने लगा है। दरअसल, पीसीसी के अनुशासन नियम की धारा 6 के तहत जिस कार्यकर्ता को पार्टी से निलंबित किया जाता है, उसे सरकारी पद से भी इस्तीफा देना होता है। सन्नी अग्रवाल को निलंबित किए जाने को लेकर पार्टी के ही भीतर असंतोष के स्वर फूटने लगे हैं। अग्रवाल को प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया का करीबी माना जाता है। इसके अलावा खनिज निगम के अध्यक्ष गिरीश देवांगन और नान के अध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल के भी वे नजदीकी हैं। ऐसे में वरिष्ठ नेताओं में भी निलंबन की इस घटना की नाराजगी फूटने की आशंका जताई जा रही है। पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि अनुशासनहीनता की कार्रवाई करने में भेदभाव क्यों किया जा रहा है?
अभी एकजुटता की दरकार
मिशन 2023 की तैयारियों में जुटी प्रदेश कांग्रेस को वर्तमान में एकजुटता की दरकार है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि विपक्षी दल भाजपा लगातार सरकार के प्रति आक्रामक है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, प्रदेश भाजपाध्यक्ष विष्णुदेव साय, पूर्वमंत्री बृजमोहन अग्रवाल समेत कई बड़े भाजपा नेता लगातार हमलावर हैं। एक ओर जहां कांग्रेस अपनी चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ा रही है, वहीं सदस्यता अभियान के जरिए नए लोगों को जोडऩा, बूथ स्तर पर मजबूती देना और तमाम तरह की रणनीतियों को अंजाम देना बड़ी चुनौती है। ऐसे में आवश्यक है कि पार्टी के तमाम धड़े अपने इगो को किनारे रखकर काम करें। 2018 में पार्टी को बड़ी जीत मिली तो इसकी वजह यही थी कि सबने मिलकर अपना 100 फीसद योगदान दिया था। किन्तु सत्ता में आने के बाद पार्टी के भीतर बढ़ती अनुशासनहीनता को भविष्य के लिए शुभ संकेत कतई नहीं माना जा सकता।




