राजनांदगांव। रिलायंस फाउंडेशन और कृषि विज्ञान केंद्र सुरगी राजनांदगांव के सहयोग से कॉन्फ्रेंस कॉल पर किसानों को दी गई जानकारी. इस कार्यक्रम में ग्राम भानपुरी, धनगांव, खपरीकला, नवागांव अन्या से 50 किसान जुड़े थे. कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र राजनांदगांव से डॉ मनीष सिंह, कृषि विशेषज्ञ युगेंद्र पांडे, रिलायंस फाउंडेशन बीज से टीमलीडर देवेंद्र पटेल, एवं प्रोजेक्ट मैनेजर बालकिशन यदुवंशी, अशोक मिश्रा एवं रिलायंस फाउंडेशन इंफॉर्मेशन सर्विस के मैनेजर मिथिलेश कुमार साहू कार्यक्रम में शामिल थे.
डॉ मनीष सिंह ने ग्रीष्म ऋतु में खेती की तैयारी विषय पर चर्चा करते हुए बताया की गर्मियों में भूमि की गहरी जुताई बहुत आवश्यक है, भूमि की दीपक लागू करने पर कीट उसके अंडे प्यूपा आदि नष्ट हो जाते हैं, इससे खरपतवार कम होते हैं और जमीन की जल धारण क्षमता बढ़ती है. गहरी जुताई करने के 10 से 15 दिन पश्चात हल अथवा रोटावेटर से जमीन की दोबारा तैयारी करनी चाहिए. जिससे जमीन अगली फसल के लिए तैयार हो जाता है.
डॉ मनीष जी ने बताया कि छत्तीसगढ़ के किसान धान की फसल लेने के पश्चात अगर फसल चक्र नहीं अपनाते हैं तो इससे जमीन की उत्पादन क्षमता धीरे-धीरे घटने लगती है आता किसानों को सलाह दी जाती है कि वह धान की फसल से पहले हरी खाद का प्रयोग करें
सनई अथवा ढेँचा की 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीच की बोनी करके एक माह में लगभग 30 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक सनईया या ढेँचा के होने के पश्चात उसमें हल के द्वारा या रोटावेटर के द्वारा मचाई करके धान की फसल की तैयारी की जा सकती है. हरी खाद को जमीन में मचाई करने के 15 दिन के बाद जमीन धान की रोपाई के लिए तैयार हो जाती है.
धान की फसल के लिए रासायनिक खाद नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटाश की मात्रा 60: 40 :25 के अनुसार करना चाहिए.
धान की उत्पादन में बीज उपचार का बहुत महत्व है, सदैव उत्तम गुणवत्ता के बीज का चयन करना चाहिए जो आपके जमीन के लिए उपयुक्त हो. बीज की बोनी से पहले बीज उपचार अत्यंत आवश्यक है बीज को फफूंद नाशक दवाई से उपचारित करने की जरूरत पड़ती है इसके लिए कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति किलो की दर से प्रयोग की जाती है साथ ही राइजोबियम कल्चर एजेटोबेक्टर पीएसबी जैसे कल्चर से उपचारित कर ही बीज की बोनी करनी चाहिए.
डॉक्टर युगेंद्र पांडे ने कृषि में मृदा परीक्षण के महत्व के बारे में बताया, उन्होंने जानकारी दी कि मिट्टी के सैंपल कैसे लें और जमीन में पोषक तत्वों को कैसे बनाए रखें। साथ ही उन्होंने किसानों से संबंधित प्रश्नों के उत्तर दिए
लक्ष्मण वर्मा जी अन्य नवागांव से उनकी शिकायत थी कि उनके खेत में दीमक की समस्या अधिक है उसका क्या उपाय है
किसी विशेषज्ञ ने की खेतों में गहरी जुताई करने से दीमक कम हो जाते हैं, धमाकों से बचने के लिए अपने खेत में खरपतवार या या कचरा को इकट्ठा ना होने दें उन्हें एकत्र कर खेत से बाहर कंपोस्ट बनाने हेतु प्रयोग करें
और दीमको को नियंत्रण करने के लिए क्लोरपायरीफास दवा 15 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से खेत में छिड़काव करें. दीमको के लिए नीम का तेल भी रामबाण जैसा इलाज करता है किसान भाई नीम के तेल का प्रयोग भी दीमकों से बचने के लिए कर सकते हैं.
भूमि का कडापन दूर करने के लिए किसानों को सलाह दी कि जैविक खाद का प्रयोग अधिक से अधिक करें जिससे भूमि में जीवांश ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ेगी. कृषि वैज्ञानिक योगेंद्र पांडे जी ने सुझाव दिया कि किसान अपने गोबर खाद के घूरे से खाद को सीधे अपने खेतों में डालने हेतु ले जाते हैं जो कि उचित नहीं है.
उन्होंने सलाह दिया कि किसान अपने घूरे से से गोबर की खाद को निकाले और उसे ट्राइकोडरमा से उपचारित करें इससे उनके खाद की गुणवत्ता बढ़ेगी इसके लिए एक ट्रैक्टर ट्रॉली गोबर की खाद में 5 किलोग्राम ट्राइकोडरमा 100 लीटर पानी में मिलाकर के 15 दिनों के लिए प्लास्टिक से ढक करके रखें, 15 दिनों के पश्चात इस खाद में हरे रंग के फफूंद उग आएगा, तत्पश्चात इसे सीधे खेत में ले जाकर के बिखरने का कार्य करें. ट्राइकोडरमा के द्वारा खाद की उपचारित करने से पोषक के बेहतर अवशोषण में मदद मिलती है एवं पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
कृषक भाइयों को धान की उन्नत तकनीक का प्रयोग करने का सलाह दिया बीज के छांटा पद्धति के बजाय कतार पद्धति से बोनी करना अथवा रोपाई करना बेहतर है बताया, इससे बीज की मात्रा में भारी कमी आती है और किसान का कृषि में खर्च घटता है.
व सलाह दिया की खेती की तैयारी के साथ उच्च गुणवत्ता के बीज समय रहते खरीदी कर लें और जून के प्रथम अथवा द्वितीय सप्ताह में बोने की तैयारी कर सकते हैं.
उन्नत तकनीकों को अपनाकर कृषक अपनी उपज में वृद्धि करके समृद्धि का मार्ग अपना सकते हैं




