नई दिल्ली (एजेंसी)। कोरोना महामारी के दौरान इंसानी फितरत नजर आई। लूट-खसोंट करने वाले चेहरे दिखाई दिए तो इन हैवानों के बीच चंद लोग इस तरह उभरे, जैसे कि वे फरिश्ते हों। उन्होंने अपने परिवार की परवाह तक नहीं की। लोगों की मदद के लिए खुद को झोंक दिया। यहां तक कि अपना घर, जगह और वक्त तक कुर्बान कर दिया। उन्होंने अपने समर्पण, साहस और जुनून से समाज को बताया कि कोरोना भले ही कितना खतरनाक क्यों न हो, लेकिन इंसानियत अभी जिंदा है…
मरीजों के लिए नहीं की परिवार की परवाह
कोरोना महामारी से जूझने का काम अगर किसी ने सबसे ज्यादा किया तो वे हमारे डॉक्टर्स हैं। उन्होंने मरीजों का इलाज करने के दौरान अपने परिवार की परवाह तक नहीं की। ऐसे ही फरिश्तों में एक हैं महाराष्ट्र की डॉक्टर प्रज्ञा। उन्होंने बालाघाट से नागपुर का सफर स्कूटी से तय किया और कोविड अस्पताल में ड्यूटी करने पहुंच गईं। वह लगातार दो अस्पतालों में काम कर रही हैं और मरीजों की जान बचा रही हैं। इसके अलावा पूरे देश में हजारों ऐसे डॉक्टर्स हैं, जिन्होंने कोरोना काल में लगातार कई हफ्ते तक ड्यूटी की। इस दौरान वे मरीजों को छोड़कर अपने घर तक नहीं गए।
किसी ने तोड़ा रोजा तो किसी ने खोला अस्पताल
कहते हैं कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। कोरोना काल में कुछ फरिश्तों ने इसे साबित भी किया। दरअसल, राजस्थान के उदयपुर में रहने वाले अकील मंसूरी ने अपना रोजा सिर्फ इसलिए तोड़ दिया, ताकि कोरोना से संक्रमित दो महिलाओं को प्लाज्मा डोनेट कर सकें। उधर, गुजरात के वडोदरा में इबादतगाह को कोविड अस्पताल में तब्दील कर दिया गया। यहां 50 बेड का अस्पताल खोला गया है। इसके अलावा दिल्ली में सिख गुरुद्वारा समिति भी कोविड मरीजों के इलाज के लिए आगे आई है। उन्होंने अपने सारे सराय और लंगर हॉल दिल्ली सरकार को सौंपने का एलान किया।




