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कृषि कानूनों पर बंटे राजनीतिक दल, खेती- किसानी बनेगा बिहार चुनाव का बड़ा मुद्दा

By @dmin
Published: October 10, 2020
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बिहार चुनाव : सीटों के बंटवारे पर कांग्रेस ने महागठबंधन तो लोजपा ने राजग को उलझाया
बिहार चुनाव : सीटों के बंटवारे पर कांग्रेस ने महागठबंधन तो लोजपा ने राजग को उलझाया
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पटना (एजेंसी)। बिहार का चुनाव लंबे समय के बाद घोटालों, रोजगार और भ्रष्टाचार से इतर अन्य मुद्दों पर भी शास्त्रार्थ का गवाह बनेगा। इसमें खेती किसानी भी बड़ा मुद्दा होगा। चुनाव के ठीक पहले तीन कृषि कानून बनाकर केन्द्र सरकार ने हवा दे दी है। इन कानूनों पर बिहार समेत पूरा देश दो ध्रुवों में बंटा है।
सत्ताधारी दल बेशक इसका तरफदार है तो विरोधी पार्टियां इसे किसानों के गर्दन पर चाकू चलाने जैसा मानती हैं। बिहार में 2006 से ही यह कानून लागू है, लेकिन इस बार इसे मुद्दा बनने का मौका मिला है।
लोकसभा चुनाव में मसला कुछ अलग रहता है। सत्ता पक्ष भी जान रहा है कि उन मसलों के आधार पर विधानसभा चुनाव जीतना आसान नहीं होता है। लिहाजा कोरोना और प्रवासी मजदूरों की बात छोड़ दें तो किसान इसबार के चुनाव में फोकस बिन्दु बनने वाले हैं। टिकट की आपाधापी खत्म होते ही दोनों पक्ष एक बार फिर इसके श्वेत-श्याम पक्ष के साथ किसानों के बीच उतरेंगे। ऐसे में कौन अपने समर्थन में किसानों को गोलबंद कर पाएगा यह तो चुनाव बाद पता चलेगा, लेकिन उनको रिझाने की हर कोशिश चुनाव पहले से ही शुरू है।
केन्द्र के इन तीन कानूनों का असर राजनीतिक दलों पर ऐसा हावी हुआ कि कांग्रेस किसानों की ‘कर्ज माफी’ भी भूल गई और भाजपा कृषि उत्पादों की कीमत दूना करने पर भी चर्चा नहीं कर रही है। हालाकि भाजपा इतना जरूरत कह रही है कि नये कानून से किसानों को लाभ होगा। जदयू भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 15 साल में कृषि विकास के लिए किये गये कार्यों की चर्चा करने से नहीं चूक रहा है। वह नये कानूनों के समर्थन में भी खड़ा है। पांच बार बिहार को मिले कृषि कर्मण पुरस्कार की चर्चा के बहाने किसानों की पीठ थपथपाने के साथ सरकार की योजनाओं को भी भुनाने का प्रयास शुरू हो गया है।
किसान सम्मान योजना की चर्चा के साथ बीमा योजना को खत्म कर राज्य सरकार द्वारा चलाई गई अपनी फसल सहायता योजना और बाढ़-सुखाड में मिलने वाले इनपुट अनुदान की चर्चा भी सत्ताधारी दल करने लगे हैं।
नये कानूनों को सत्ताधारी दल के उम्मीदवार व बड़े नेता किसानों की स्वतंत्रता का मूल मंत्र बताते हैं। उनके अनुसार किसानों को अपने उत्पाद की कीमत तय करने की स्वतंत्रता मिलेगी तो किसान अपना अनाज देश की किसी मंडी में बेच सकेंगे। इससे उलट विपक्ष में खड़े लोग इस सवाल से सत्ता पक्ष को घेरते हुए किसानों को ‘सच’ बताने में लगे हैं कि सरकार बताये अभी किस कानून से किसान दूसरी मंडियों में अनाज नहीं बेच पाते हैं। राज्य में किसानों के पास औसत दो एकड़ ही जमीन है। इतने छोटे किसान कैसे अपना अनाज बेचने बाहर जाएंगे। उनका आरोप यह भी है केन्द्र सरकार इन नये कानूनों के सहारे किसानों की जमीन को अपने चहेते लोगों के हाथों में गिरवी रखने की साजिश कर रही है। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को खत्म करना चाहती है।
कांग्रेस के बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल ने इस मसले पर आंदोलन की शुरुआत चुनाव की घोषणा के साथ ही कर दी है। सत्ताधरी दल की ओर से राज्य के कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार और पूर्व केन्द्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह को किसानों की बीच ‘सच’ ले जाने का भार सौंपा है। बहरहाल किसानों को लामबंद करने की कवायद अब शुरू हो गई है। लेकिन चुनाव में किसका तर्क किसानों को अपनी ओर आकर्षित करेगा यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार के चुनाव में किसान और कृषि विकास एक बड़ा मुद्दा बनेगा।

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