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आ अब लौट चलें
प्रकृति की गोद में

By @dmin
Published: April 12, 2020
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  • अदृश्य ईश्वर कौन है ? जवाब ईश्वर अदृश्य नही है। साक्षात है। प्रमाणित है, प्रकृति के रूप में। हर सुबह उम्मीद की ऊर्जा लेकर उगता सूर्य। जिसे हिन्दू धर्म मे सूर्य देव कहा जाता है। यही तो ईश्वर है। हमें प्राणवायु देने वाले पेड़ पौधे यही ईश्वर है। सनातन काल से जिनकी हम पूजा करते आए हैं। तुलसी, पीपल, आंवला, हमारे खेत खलिहान, नदी सरोवर। हमारे जंगल, नदियां, सरोवर, हमारी जमीनें, हमारे गांव, हमारी गायें यही तो ईश्वर है।

हिन्दू धर्म के लोग हर तीज त्यौहार में किसी न किसी रूप में प्रकृति की ही पूजा करते हैं। ग्रहों का सहीं आंकलन करने वाला प्राचीन विज्ञान कितना विकसित था। जब दुनिया की पूरी आबादी कच्चा मांस खाती थी, नग्न घूमती थी ऋषि मुनियों ने हमारे पूर्वजों ने खगोल विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान में महारत हासिल कर लिया था। भारत को प्रकृति के साथ जोड़ दिया था। इसलिए हिन्दू धर्म को विज्ञान आधारित धर्म कहा जाता है।

समयचक्र, विदेशी आक्रमणकारियों ने, तथा हिन्दू धर्म में अंधविश्वास और पाखंड का बीज बोने वालों ने एक साजिश के तहत बहुत कुछ नष्ट कर दिया। दुनिया को राह दिखाने वाला भारत वर्ष विकास की दौड़ में ठहर गया। दुनिया के देश तेजी से आगे बढ़ते गए। अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करते चले गए। उन्होंने अर्थतंत्र को मानव सभ्यता का विकास समझा, और प्रकृति से जमकर खिलवाड़ करते गए।
8 सौ सालों की गुलामी ने हमारी बुद्धि को भी जड़कर दिया। हम भी प्रकृति विनाशी देशों के पीछे दौड़ पड़े। तीर्थ उजाड़कर ओद्योगिक तीर्थ बनाएं। जंगलों का सफाया किया। 70 प्रतिशत जंगल उजाड़ दिए। नदियों को माता का दर्जा दिया और उसी में उद्योगों का गंदा पानी उड़ेलते रहे, लाशें बहाते रहे।
ऑक्सीजन देने वाले पेड़ों को काटते रहे। हमने शहरी चकाचौंध में अपने गांव छोड़ दिए। खेत खलिहान छोड़ दिया। पलायन किया। किसानी छोड़ दिया,मजदूर बन गए।
इन 70 सालों में हमने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। तालाबों के महत्व को नहीं समझा। अपने गांव अपनी गाय का महत्व नहीं समझा। बस दौड़ते गए भागते गए। थक गए और दम तोड़ते चले गए। नतीजा क्या हुआ….

  • खेती का रकबा सिकुड़ गया, खेत की जगह वैध अवैध प्लेटो ने ले लिया
  • जीवनदायनी नदिया प्रदूषित होती गई। तालाब पटने लगे। जलस्तर 4 से 5 सौ फीट नीचे चला गया। जल की सतह पर स्थित पलोराइड, आर्सेनिक, लोहा, सीसा, पारा जल की सतह पर आ गए।
  • हमने अपने जंगल काटे, पेड़ काटे, नतीजा वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती गई। धरती गर्म होती चली गई। तपने लगी। ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ गया।
  • विकास के नाम पर वाहनों का उत्पादन तथा अनावश्यक मांग बढ़ गई। सड़कों पर बेमतलब भी बड़ी तादात में वाहन दौड़ने लगे।ये उद्योग और वाहन हर साल 36 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड वायुमण्डल में छोड़ने लगे।
  • हमने अपने गांव गाय को छोड़ा अपनी सभ्यता और महान संस्कृति से दूर होते चले गए।

जो आजतक दुनिया भर के पर्यावरणविद बोलते आए वो लोगों को आज समझ आ रहा है। भला हो लॉकडाउन का जिसने बहुत कुछ सीखा दिया। ये प्रकृति है जनाब खुद को एडजेस्ट करना जानती हैं। अब प्रकृति को छेड़ोगे तो वो आपको छोड़ेगी नहीं। हलचल तो मचाएगी ही। तबाही तो लाएगी ही।

आज देखिए

  • प्रचंड गर्मी वाले अप्रैल माह में भी कितनी शीतलता गई। कूलर और एसी के बिना भी लोगों का काम चल रहा है।
  • शहर में भी गांव जैसा सन्नाटा है। वाहनों के सायलेंसर खामोश है, ध्वनिप्रदूषण बंद हैं। चिड़ियों की चहचहाट, कोयल की कु कु सुनाई दे रही है।
  • प्रदूषण का स्तर 80 प्रतिशत नीचे चला गया। आसमान साफ हो गया। हवा शुद्ध हो गई। नदियों का पानी नहाने लायक हो गया।
    हालांकि ये सब कुछ दिन का है।लॉकडाउन खत्म होते ही लोग सबकुछ भूलकर फिर प्रकृति से खिलवाड़ शुरू कर देंगे। फिर सबकुछ जस का तस पहले जैसा। वही चिलचिलाती और पसीना निकालती धूप, वही गंदा पानी, वहीं प्रदूषित हवा…

पर अब नहीं। आइए संकल्प लें प्रकृति से जुड़ने का। प्रकृति की पूजा का। प्रकृति है तो हम हैं। हमारी आने वाली पीढ़ी है।

घर पर रहिए, लॉकडाउन का पालन कीजिये
( संतोष यादव- अध्यक्ष
पर्यावरण संरक्षण समिति एवम वरिष्ठ पत्रकार भिलाई – 3 )

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