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छत्तीसगढ़ सरकार गरीब बच्चों के साथ कर रही है मजाक

By @dmin
Published: January 23, 2020
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रायपुर। राज्य सरकार शिक्षा का अधिकार कानून के अंतर्गत गरीब बच्चों को प्राईवेट विद्यालयों में कक्षा बारहवी तक निःशुल्क शिक्षा देने का दावा कर रही है।
शिक्षा का अधिकार कानून 2009 की धारा 3 की उपधारा 2 में निःशुल्क शब्द का तात्पर्य यह कि कोई बच्चा किसी भी प्रकार से शुल्क अथवा प्रभार अथवा व्यय का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं, जो उसे अपनी शिक्षा जारी रखने और पूरी करने से रोक सकता है, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार के शिक्षा मंत्री डा. प्रेमसाय सिंह टेकाम ने छत्तीसगढ़ विधानसभा में लिखित जवाब दिया कि आरटीई के अंतर्गत प्रवेशित गरीब बच्चों को सरकार ड्रेस, कॉपी-किताब, जूता-मोजा खरीदने के लिये 790 रूपये प्रति विद्यार्थी प्रतिवर्ष देती है। किस प्राईवेट स्कूल में इतने रकम में ड्रेस, कॉपी-किताब और जूता-मोजा आ जायेगा यह समझ से परे है। प्रत्येक गरीब बच्चा जो आरटीई के अंतर्गत किसी भी प्राईवेट स्कूल में प्रवेश लेता है वह ड्रेस, कॉपी-किताब और जूता-मोजा के लिये कम से कम 10 हजार अपने स्वयं से व्यय कर रहा है और सरकार सिर्फ 790 रूपये दे रही है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट दो बार इस संबंध में आदेश दे चुकी है कि प्रवेशित बच्चों को ड्रेस और कॉपी-किताब उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। आरटीई अनुच्छेद 8 (व्याख्या) (1) व (2) के अनुसार राज्य निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने और अनिवार्य दाखिले, उपस्थिति और शिक्षा पूर्ण करने को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है। गरीब बच्चों को कक्षा बारहवीं तक प्राईवेट स्कूलों को निःशुल्क शिक्षा दिलवाने का दावा की हवा निकल रही है।
छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसियेशन के प्रदेश अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल का कहना है कि शिक्षा का अधिकार कानून का समुचित लाभ गरीब बच्चों को नहीं मिल रहा है। इस संबंध में बच्चों को हो रही परेशानी के विषय में उनके द्वारा दो बार शिक्षा सचिव और संचालक को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेशों का कड़ाई से पालन कराने को कहा जा चुका है, जिसके पश्चात् शिक्षा विभाग ने सिर्फ 140 रूपये की ही वृद्धि किया, क्योंकि पूर्व में ड्रेस और कॉपी-किताब के लिये प्रति बालक प्रतिवर्ष 650 रूपये दिया जाता था, जो अब बढ़ाकर 790 रूपये कर दिया गया है, लेकिन यह राशि बहुत कम है, जिसे तत्काल बढ़ाया जाना चाहिए। श्री पॉल का कहना है कि सरकार में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों के द्वारा गरीब बच्चों के हितों के बारे में गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा है और सरकार भी इस मामले को लेकर गंभीर नहीं है।

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