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Gustakhi Maaf: अगर कोली को फांसी हो जाती

By Om Prakash Verma Published November 14, 2025
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
अगर कोली को फांसी हो जाती तो क्या न्याय हो जाता? यह एक यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब ढूंढा जाना चाहिए. 29 दिसम्बर 2006 को जब देश न्यू ईयर मनाने की तैयारी कर रहा था, नोएडा के एक नाले से नर कंकाल के बाद नर कंकाल बरामद हो रहे थे. ये सभी कंकाल बच्चों औऱ किशोरों के थे. यहां आसपास के मोहल्लों से दर्जन भर से अधिक बच्चे लापता हो चुके थे. पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज थी पर पुलिस ने इन सभी को घर से भागा हुआ मान लिया था. पर जब कंकाल बरामद हुए तो उसके हाथ पांव फूल गए. नाले के करीब ही एक डूप्लेक्स घर था – मोनिंदर सिंह पंधेर का. पंधेर एक बड़ा व्यवसायी था और अक्सर घर से बाहर ही रहता था. घर की जिम्मेदारी थी उसके नौकर सुरेन्द्र कोली पर. पुलिस ने कोली को गिरफ्तार किया. उसका कबूलनामा तैयार किया. कुछ फोरेंसिक साक्ष्य भी जुटाए. निचली अदालतों ने तीन साल की सुनवाई के बाद कोली को फांसी की सजा सुनाई. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कुछ मामलों में सजा को बरकरार रखा. 2011 में इनमें से कुछ सजाओं को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा. कोली ने दया याचिका लगाई पर फैसले में देरी के चलते उसकी सजा को 2015 में उम्र कैद में तब्दील कर दिया गया. 16 अक्टूबर 2023 को हाईकोर्ट ने यह कहते हुए 12 मामलों में कोली को बरी कर दिया कि साक्ष्य संदेह से परे नहीं हैं. केवल रिंपा हालदार मामले में सजा बरकरार रखी. 11 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उसी आधार पर रिंपा वाले मामले से भी कोली को बरी कर दिया. अब सवाल यह है कि बच्चों की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या गरीब परिवारों के बच्चे, बच्चे नहीं होते? अक्सर पुलिस ऐसे परिवारों के मुंह पर कह देती है, “भाग गई होगी तुम्हारी बेटी”. वह तो कंकालों ने केस की दिशा बदल दी. वरना इस तरह के हजारों मामले देश के पुलिस थानों में धूल फांक रहे हैं. कोली को फांसी मिल भी जाती तो क्या न्याय हो जाता? क्या पुलिस देशभर में लापता हो रहे बच्चों के मामलों में संवेदनशील हो जाती? एनसीआरबी डेटा के मुताबिक 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,77,335 मामले दर्ज किये गये. यह 2022 में दर्ज मामलों से 9.2 प्रतिशत अधिक था. 2023 में दर्ज मामलों में से 45 प्रतिशत मामले अपहरण के थे जबकि 38.2 प्रतिशत मामले पोक्सो के तहत दर्ज किये गये. 2023 की स्थिति में देश के 47000 बच्चे लापता थे. इनमें से 71.4 प्रतिशत संख्या लड़कियों की थी. ऐसा नहीं है कि इन मामलों में कुछ किया नहीं जा सकता. गृह मंत्रालय ने लापता बच्चों के उद्धार के लिए जब ऑपरेशन मुस्कान चलाया तो हजारों की संख्या में बच्चे खतरनाक परिस्थितियों से मुक्त कराए गए. ऐसे प्रत्येक मामले की अच्छी पड़ताल हो इसके लिए पुलिस के साथ ही समाज को भी आगे आना होगा.

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