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Gustakhi Maaf: गाय-गोबर और विज्ञान

By Om Prakash Verma
Published: April 16, 2025
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
लोग भले ही सनातन की दुहाई दें पर भारतीय ज्ञान परम्परा को लेकर उसके मन में आज भी दुविधा है। यही दुविधा दिल्ली विश्वविद्यालय में किये जा रहे एक प्रयोग का काल बन गई। दरअसल, यहां एक रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत परिसर में स्थित पोर्टा केबिन की दीवारों पर गोबर और मिट्टी का लेप लगाया जा रहा था। मान्यता है कि गोबर एक बेहतरीन इंसुलेटर है जो तापमान को नियंत्रित करने में सक्षम है। पारम्परिक घरों को इसीलिए गोबर से लीपा जाता था। पर इसका कोई साइंटिफिक डेटा नहीं है। इसलिए, यहां प्रयोग के तौर पर एक कक्ष की दीवारों को गोबर-मिट्टी से पोता जा रहा था ताकि डेटा कलेक्ट किया जा सके। कमरे की दीवारों को गोबर से पोतने का काम खुद प्राचार्य प्रत्यूष वत्सला ने अपने हाथों से किया तथा इसका विडियो भी शेयर किया। यदि इसे कारगर पाया जाता तो यह एक क्रांतिकारी कदम हो सकता था। पर जैसा कि आम भारतीय मानसिकता है, इसे बेवकूफाना और गरीबपना मान लिया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ ने इसकी शिकायत कुलपति से कह दी। ठाठ बाट में यकीन रखने वाले कुलपति को प्रोजेक्ट समझ में ही नहीं आया। उन्होंने कहा कि यदि प्राचार्य को गोबर मिट्टी पर प्रयोग करना है तो उन्हें ऐसा अपने घर पर या अपने दफ्तर में करना चाहिए था। उनकी समझ के अनुसार शायद रिसर्च केवल प्रयोगशालाओं में होती है। रिसर्च को बड़ा और सम्मानजनक होना चाहिए ताकि उसका ढिंढोरा पीटा जा सके। उनकी समझ में यह बात आई ही नहीं कि यदि गोबर-मिट्टी के लेप से कमरों का तापमान नियंत्रित किया जा सकता है तो देश का एसी-कूलर और रूम हीटर पर होने वाला बिजली का खर्च बच सकता है। बिजली बचाने का मतलब भी पर्यावरण की सुरक्षा करना है। गोबर में इसके अलावा भी कीट-पतंगों को दूर रखने की क्षमता होती है। उलटे कुलपति ने कहा कि कूलर-पंखों की कमी को दूर करना चाहिए। कॉलेज के पास फंड की कमी नहीं है। कॉलेज के पास स्टूडेंट डेवलपमेंट फंड है और भी कई तरह के फंड होते हैं, उनका इस्तेमाल होना चाहिए। बिजली की बचत और पर्यावरण की सुरक्षा की बात तो उनके दिमाग में आई ही नहीं। आती भी कैसे, कुलपति चुने जाने का कोई ठोस मापदंड तो है नहीं। उनकी समझ में यह नहीं आया कि गोबर सहज उपलब्ध है। यदि गोबर का कोई ढंग का उपयोग ढूंढ कर निकाला गया तो जिन मवेशियों को लोग आज सड़कों पर घूमते हुए देखते हैं उनके लिए कोई-न-कोई अंबानी-अडानी फार्म हाउस बना रहा होगा। इसके साथ ही जहरीले केमिकल्स का घरेलू उपयोग बंद होगा। छत्तीसगढ़ में एक कोशिश हुई थी गोबर की उपयोगिता बढ़ाने की। इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आए भी। तारीफ भी की पर इसकी उपयोगिता इससे आगे नहीं बढ़ पाई। गाय-गोबर में केवल आस्था ही है – इसे सनातन ने इतना महत्व क्यों दिया, यह सोचने की फुर्सत किसी को नहीं है।

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