-दीपक रंजन दास
शादियां भले ही पूरी दुनिया में होती हों पर सभी जगह इसके रीतिरिवाज अलग-अलग हैं. कुछ जगहों में तो शादी से ऐसी भी परम्पराएं जुड़ी हैं कि कभी-कभी जान पर बन आती है. भारत में भी विवाह की अलग-अलग परम्पराएं हैं. हिन्दी फिल्मों और टीवी सिरियलों ने अब शादियों को भड़कीला और खर्चीला भी बना दिया है. आम भारतीय मध्यमवर्गीय को एक बेटी का विवाह करवाना इतना भारी पड़ता है कि वह बेटी के जन्म के बाद से लेकर उसके विवाह तक सिर्फ तैयारियां ही करता रह जाता है. पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में तो लड़कियों के हाथ पीले करना एक ऐसी समस्या बन गई कि वहां बेटियों का गर्भ में ही कत्ल होने लगा. लिंग अनुपात कुछ ऐसा बिगड़ा कि वहां के दूल्हों के लिए गरीब परिवारों की लड़कियां देश के विभिन्न भागों से खरीदी जाने लगीं. यहां तक कि पड़ोसी मुल्कों की गरीब लड़कियों को भी खरीदा जाने लगा. इसे रोकने कि दिशा में अब युवा जोड़े पहल करने लगे हैं. हरियाणा के सिरसा में रहने वाले दूल्हे ने राजस्थान में जाकर विवाह किया. शगुन के तौर पर केवल एक रुपया लिया. रिश्तेदारों से कोई शगुन लेने से वर-वधु ने साफ इंकार कर दिया. इससे पहले हरियाणा के ही रेवाड़ी का निवासी एक फौजी भी एक रुपया शगुन लेकर विवाह कर चुका है. दान-दहेज जहां एक सामाजिक कुरीति है वहीं शादियों पर होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा वैवाहिक लिबास हैं. दुल्हन का एक लहंगा 50 हजार का. दूल्हे की शेरवानी भी 30-40 हजार की. लोग कहते हैं शादी एक ही बार होती है. अब नहीं पहने तो कब पहनेंगे. 4-5 लाख रुपए तो फोटो शूट और वीडियोग्राफी पर ही खर्च कर दिये जाते हैं. इसका एक बड़ा बाजार भी है. विवाह संस्कारों पर यह दिखावा भी भारी है.





