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Gustakhi Maaf: कहीं इतनी सस्ती भी न हो जाए भक्ति कि…

By Om Prakash Verma
Published: January 22, 2024
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
लगभग 500 वर्षों के संघर्ष के बाद आज पुण्यभूमि अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो गई. यह संभवतः देश के इतिहास में पहली बार है कि प्रभु श्रीराम के बाल रूप की पूजा होगी. अब तक हमारी कल्पना में या तो राम-दरबार की तस्वीर अंकित है या फिर धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए श्रीराम की. बाल रूप में तो श्रीकृष्ण की ही पूजा होती रही है. लोग सखा भाव से उनके साथ खेलते-कूदते, नाचते-गाते रहे हैं. बाललीला की इस कड़ी में अब त्रेतायुग के अवतार श्रीराम का नाम भी जुड़ गया है. राम लला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उत्सुकता केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में है. आज पूरा देश भगवा तोरणों और प्रभु श्रीराम और महाबली हनुमान के ध्वजों से सजा हुआ है. देश भर में आज आवश्यक सेवाओं को छोड़कर अवकाश है. लोगों ने टीवी पर प्राण प्रतिष्ठा के अंतिम चरण रामलला के नेत्रदान संस्कार के दर्शन किये. पर भक्ति का एक भौंडा तरीका भी है. भक्तों ने गली मोहल्लों में, भाड़े के साउंड सिस्टम पर भोर साढ़े चार बजे हनुमान चालीसा और भजन लगा दिया और फिर चुपचाप घर जाकर रजाई ओढ़ ली. चलते-चलते कोई नुक्स आ गया तो स्पीकर लगे चीं-चीं करने. लोगों की नींद खराब हुई. सुबह-सुबह झल्ला भी गए. वैसे उपद्रव तो इससे पहले ही शुरू हो चुका था. पिछले दो-तीन दिन से लोग गाड़ियों पर झंडा लगाए वायु-वेग से मानो संजीवनी बूटी लाने के लिए भागे जा रहे हैं. इन्हें रोकते-टोकते समझाते पुलिस भी झल्लाकर सड़क से हट गई. वैसे उत्साह के अतिरेक में ऐसी छोटी-मोटी गलतियां हो जाती हैं. अब जबकि अयोध्या में प्रभु श्रीराम की पुनर्स्थापना हो गई है तो इस अभियान का दूसरा चरण प्रारंभ होता है. रामायण त्रेतायुग की संस्कृति का भी प्रतीक है. एक ऐसी संस्कृति जिसमें पिता के वचन को निभाने के लिए युवराज हंसते-हंसते वनवास स्वीकार कर लेते हैं. भरत जैसे भाई सिंहासन पर बड़े भाई की चरण-पादुका रखकर राजकाज चलाते हैं. जहां कुंभकर्ण जैसे भाई और मेघनाद जैसे पुत्र, पिता की आज्ञा पर निःसंकोच अपना सर्वोच्च बलिदान दे देते हैं. जहां एक निर्वासित युवराज जंगल में जाकर भीलनी के जूठे बेर खाता है. रामायण उस सीता की भी कहानी है जिसने सहधर्मिनी व्रत का पालन करते हुए आभूषण और राजसी वस्त्र त्यागकर वृक्षों की छाल से बने वल्कल वस्त्र पहन लिये और नंगे पांव पति के साथ जंगल चली गई. भ्राता लक्ष्मण ने भैया-भाभी की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने के लिए स्वयं को भी राज्य से निर्वासित कर लिया. सीता हरण के दोषी महाप्रतापी, त्रिलोक विजयी रावण से युद्ध करने के लिए श्रीराम ने अयोध्या से फौज नहीं मंगवाई बल्कि वानरों और रीछों की सेना का नेतृत्व किया. यह केवल आस्था का प्रश्न नहीं है बल्कि एक पूरा जीवन दर्शन है. अनुशासन, समर्पण, उच्च आदर्श, संगठन क्षमता और नेतृत्व विकास का इससे अच्छा कोई उदाहरण हमें नहीं मिलेगा.

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