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Gustakhi Maaf: दण्कारण्य, शबरी और ढेर सारा कन्फ्यूजन

By Om Prakash Verma Published January 17, 2024
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
प्रभु श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास मिला था. भ्राता श्रीलक्ष्मण एवं माता सीता भी उनके साथ चली थीं. वनवास के 12 वर्ष बाद वे चित्रकूट से पंचवटी पहुंचे. यहां रावण ने छल से सीता माता का अपहरण कर लिया. माता सीता की तलाश में श्रीराम और लक्ष्मण दण्डकारण्य पहुंचे. यहां उनकी भेंट माता शबरी से हुई जो उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं. माता शबरी को ऐसा आदेश मतंग ऋषि ने दिया था. मतंग ऋषि के बताए अनुसार शबरी ने प्रभु श्रीराम को किष्किंधा के राजा सुग्रीव के विषय में बताया जो उनकी मदद कर सकते थे. अब सवाल यह उठता है कि यह दण्डकारण्य कहां है, माता शबरी से प्रभु श्रीराम की मुलाकात कहां हुई और कहां उन्होंने प्रभु को बेर खिलाए. शबरी का बचपन का नाम श्रमणा था. वह शबर जाति की भील राजकुमारी थी. छत्तीसगढ़ में प्रचलित मान्यता के अनुसार दंडकारण्य का पठार भारत के मध्यवर्ती भाग में है इसका विस्तार वर्तमान भारत के छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य में हैं. मान्यता है कि माता सीता की खोज में श्रीराम-लक्ष्मण दण्कारण्य में माता शबरी से मिले. वे मतंग ऋषि के आश्रम में रह कर उनकी ही प्रतीक्षा कर रही थीं. यह स्थान शिवरीनारायण में महानदी, जोंक और शिवनाथ नदी के तट पर स्थित है. यहां बरगद का वह पेड़ भी है, जिसके पत्तों में माता शबरी ने श्रीराम-लक्ष्मण को बेर दिये थे. इस बरगद के पत्ते दोने के आकार के हैं. इस वृक्ष का वर्णन सभी युगों में मिलता है. तीन नदियों के मिलन के कारण शिवरीनारायण को गुप्त प्रयाग भी कहा जाता है. शिवरीनारायण को महाप्रभु जगन्नाथ का मूल स्थान भी माना जाता है. माघी पूर्णिमा के दिन महाप्रभु शिवरीनारायण आते हैं. यहां मंदिर में रोहिणी कुंड है, जिसका जल कभी कम नहीं होता. एक अन्य मान्यता के अनुसार दक्षिण-पश्चिम गुजरात के डांग जिले के आहवा से 33 किलोमीटर और सापुतारा से लगभग 60 किलोमीटर दूर सुबीर गांव के पास शबरी धाम है. पम्पा सरोवर भी यहीं है. यहां शबर जाति के भीलों की सबसे बड़ी आबादी रहती है. अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के अनुष्ठान चल रहे हैं. इस बीच शबरी धाम से शबर भीलों की एक टोली भी यहां पहुंची है. वे अपने साथ वह छोटे-छोटे बेर भी लाए हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि शबर धाम की एक पहाड़ी पर स्थित छोटे-छोटे बेर के पेड़ रामायणकाल से ही अस्तित्व में हैं. मान्यता है कि शबरी ने इन्हीं पेड़ों के बेर श्रीराम-लक्ष्मण को अर्पित किये थे. एक मान्यता यह भी है कि पंपा सरोवर कर्नाटक में है जिसके पास ही मतंग ऋषि का आश्रम है. बेलगाम जिले के रामदुर्ग तालुके में शबरी कोल्ला मंदिर भी है. हम्पी यहां से ज्यादा दूर नहीं है जिसे किष्किंधा माना जाता है. अयोध्या में राम-लला की प्राण प्रतिष्ठा से इन तीनों मान्यताओं का भी संगम सुनिश्चित है.

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Om Prakash Verma January 17, 2024
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