-दीपक रंजन दास
..तो क्या… आजकल तेरे-मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर, सबको मालूम है और सबको खबर हो गई. बिलासपुर पुलिस ने ट्रैफिक रूल्स तोडऩे वाले लोगों का ब्यौरा इकठ्ठा करने की कोशिश की तो उसके होश उड़ गए। एक दिन में इका किये गये आंकड़ों ने बताया कि 1।23 लाख लोगों ने यातायात के नियम तोड़े। वैसे बहुत सारे लोग पुलिस की नजर में आने से बच भी गए होंगे। पुलिस ने कुछ नेता और पत्रकारों को इग्नोर भी किया होगा। यह हाल अकेले बिलासपुर का नहीं है। रायपुर, भिलाई-दुर्ग, राजनांदगांव, जगदलपुर, अंबिकापुर।।। अर्थात जितने भी शहर हैं, लगभग सभी जगह यातायात का यही हाल है। हो भी क्यों नहीं, हम सभी आजाद देश के आजाद नागरिक हैं। अब तो हमारे पास पैसा भी है। लोन देने वाले भी चौक-चौराहों पर बैठे हैं। लिहाजा गाड़ी अब हर किसी के पास है। जिन्हें साइकिल चलाने की तमीज नहीं, उनके पास भी कारें हैं। गाड़ी वाले तो गाड़ी वाले, पैदल चलने वाले भी कुटुमसर गुफा की अंधी मछलियों की तरह सड़कों पर तफरीह करते हैं। किसी वाहन चालक को पीछे से हार्न दो या हेडलाइट की लप-झप से अपनी उपस्थिति का अहसास कराना तो फिर भी समझ में आता है, पर यहां तो सामने से आने वालों को भी हार्न बजाकर जगाना पड़ता है। यकीन न आता हो तो राइट टर्न इंडीकेटर देकर देख लेना। पीछे वाला हार्न बजाने लगेगा और सामने वाला स्पीड बढ़ा देगा। बावजूद इसके हमारी सड़कों पर एक्सीडेंट कम होता है तो इसकी एकमात्र वजह यह है कि हमने सुरक्षा की जिम्मेदारी भगवान पर छोड़ रखी है। गाड़ी के सामने बना स्वस्तिक, खण्डा, 786 हमारी सुरक्षा करता है। कभी एक्सीडेंट हो गया तो समझ लो कि आपका भगवान आपसे नाराज है। इसके बाद ठीक होने की मन्नत मांग लो। अस्पताल और डाक्टर क्या करेंगे। जिसे ‘वो’ रखेगा वही बचेगा, बाकी का जाना तय है। ऐसे माहौल में ट्रैफिक रूल्स बनाए ही क्यों गए हैं। राज्य के अधिकांश ट्रैफिक आइलैंड भी महज डिवाइडर का काम करते हैं। कोरबा में एक पुलिस कर्मी ने पैदल चल रहे लोगों पर कार चढ़ा दी। वह नशे में धुत था। यही पुलिस सड़क किनारे खड़े होकर मशीन से लोगों का मुंह सूंघती नजर आती है। आखिर इसका क्या फायदा? हर शहर में दारू दुकान और बार हैं। अभी यहां ड्राइवर लेकर चलने का रिवाज नहीं है। नशा करने के बाद ठेके पर या बार में सोने की व्यवस्था भी नहीं है। लिहाजा नशा करने के बाद वो घर तो लौटेंगे ही। पुलिस वहीं क्यों नहीं खड़ी हो जाती। जैसे ही कोई दारू पीकर निकले, उसे टैक्सी में बैठाकर, उसीके खर्च पर घर भेज दे। खर्चा बढ़ेगा तो लोग अपने घर में बैठकर पिएंगे। दारू पीकर पुलिस को चकमा देना तो आसान है पर बीवी तो एक किलोमीटर दूर से सूंघ लेती है। पियक्कड़ों की संख्या वैसे ही कम हो जाएगी।
Gustakhi Maaf: सवा लाख ने तोड़ा ट्रैफिक रूल तो क्या




