-दीपक रंजन दास
भिलाई के टीआई मॉल चौक पर सामने लाल बत्ती थी। बड़ी गाडिय़ां रुकी हुई थीं। आदत से लाचार पढ़े लिखे जाहिल दुपहिया सवार आगे निकलने की कोशिश कर रहे थे। लगातार हार्न बजा रहे थे। पर अब शहरी आबादी हार्न की आवाज के प्रति बहरी हो चुकी है। वैसे सुन भी लेते तो क्या ही करते। जगह देने के लिए जगह तो थी ही नहीं। बहरहाल, बत्ती हरी हुई और वाहनों का रेला आगे बढ़ा। दाएं मुडऩे वाले सड़क की बाई ओर और सीधे जाने वाले दाहिनी ओर थे। एक दूसरे का रास्ता काटकर ही ऐसे निकलना संभव था। अभी गाडिय़ां निकली ही थीं कि दाईं तरफ से दो तीन बाईक और स्कूटी पूरी रफ्तार से रेड लाइट जम्प कर आगे निकलीं। दो तो बाल-बाल बच गए पर तीसरा टकरा ही गया। भिलाई ही क्यों, छत्तीसगढ़ की सड़कों पर ऐसा रोज होता है। लोग जानबूझकर खतरों से खेलते हैं। इसमें उन्हें ‘किकÓ मिलता है। वैसे तो ‘किकÓ का शाब्दिक अर्थ लात होता है पर यह लात थोड़ी अलग किस्म की है, इसमें मजा आता है। साएं से, सुर्रर्र… से दूसरों के आगे निकल जाने का मजा ही कुछ और है। पर इसी तरह की बेजा हरकतों के कारण चौक-चौराहों पर रोजाना गाडिय़ां ठुकती हैं। गाडिय़ों का मुंह-नाक-आंख का फूटना तो होता ही है सवारों के भी हाथ पैर छिल जाते हैं। झगड़े भी होते हैं। गंदी जुबान में कुछ स्टैण्डर्ड मंत्र भी पढ़े जाते हैं। आंखें भी तरेरी जाती हैं। पर सरकार है कि समझती नहीं। उसे अब भी लगता है कि लोगों को नियम कानूनों की जानकारी देने की जरूरत है। इसके लिए उसने खास प्रबंध भी किये हैं। अब (?) बिना प्रशिक्षण के लाइसेंस नहीं मिलेगा। भारी वाहनों का लाइसेंस बिना दो दिवसीय प्रशिक्षण के रीन्यू नहीं होगा। निलंबित लाइसेंस को दोबारा जिंदा करने के लिए भी प्रशिक्षण लेना होगा। इसके लिए रायपुर में ITDR स्थापित की गई है। टीबी के मरीज को सर्दी खांसी की दवा दी जा रही है। अब सड़कों पर शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे लाल-हरी-पीली बत्ती का मतलब समझ में न आता हो। पर वह आदत से लाचार है। सड़क हादसों में मरने वाले लोगों में दो तिहाई दुपहिया सवार होते हैं। अधिकांश दुपहिया वाहनों की अधिकतम उम्र 5-6 साल है। फिटनेस या आरसी का मुद्दा पैदा ही नहीं होता। ज्यादा से ज्यादा बीमा नहीं होगा या खीसे में लाइसेंस नहीं होगा। पर हादसों की वजह यह भी नहीं है। हादसों की मुख्य वजह है लोगों का बेपरवाह एटीट्यूड अर्थात नजरिया। इसे ठीक करने के लिए नियम तोडऩे वालों की गाडिय़ां छीन कर नीलाम करनी होगी। फाइन या लाइसेंस निलंबन से इनका कुछ नहीं बिगडऩे वाला। साथ ही, नीलामी का यह पैसा पुलिस वेलफेयर फंड में और इसका एक छोटा हिस्सा गाड़ी पकडऩे वाले को दे दिया जाए तो सब को मोटिवेशन मिल जाएगा। लोग ट्रैफिक लाइट का सम्मान करना शुरू कर देंगे।





