-दीपक रंजन दास
भिलाई नगर निगम पर आरोप है कि वह वायु प्रदूषण मापने के यंत्रों के लिए मिला पैसा सड़कों के किनारे पेवर ब्लाक लगाने में खर्च कर रहा है. तो इसमें गलत क्या है? हवा में धूल कणों की मात्रा कितनी है, इसे जांचने से तो अच्छा है कि हवा में धूल की मात्रा को ही कम कर दिया जाए. जब बीमारी पता हो तो जल्द से जल्द इलाज शुरू कर देना अच्छा रहता है. यह कोई बीपी या शुगर तो है नहीं कि दवा की मात्रा तय करनी पड़ेगी. ट्विन सिटी के लोगों के लिए धूल ही प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक है. जिन्हें सांस की तकलीफ है, वो खूब परेशान होते हैं. सड़कों पर उड़ती यह धूल आंख-नाक-मुंह में घुस जाती है. कपड़ों और बालों का रंग तक बदल देती है. धूल से बचने के लिए 90 फीसदी युवा बुर्का पहनने लगे हैं. गाड़ियों को रोज धोना या फटकना पड़ता है. भिलाई शहर में इस धूल की एक बड़ी वजह है, सड़क किनारे की मिट्टी. गाड़ी का एक पहिया सड़क छोड़ता है और धूल का गुबार उड़ाता चला जाता है. बारिश के दिनों में टायर कीचड़ उठा लाते हैं और उससे सड़क को लीप देते हैं. कीचड़ सूख कर धूल के बारीक कणों में तब्दील हो जाता है. शहरों में सर्वाधिक चहल-पहल सड़कों पर ही होती है इसलिए धूल भी सर्वाधिक सड़कों पर ही उड़ती है. धूल वाले प्रदूषण से शहर को बचाने के लिए भिलाई नगर निगम ने सड़कों के किनारे पेवर ब्लाक लगाने की योजना बनाई. जिन इलाकों में यह काम हो चुका है, वहां बड़े वाहनों के पीछे चलना आसान हुआ है. अधिकांश मैदानों में हलचल शून्य हो चुकी थी. अब यहां खेलों के इंतजाम हो रहे हैं. अधिकांश मैदानों को घेर कर वहां विकास कार्य किये जा रहे हैं. पाथवे बन रहे हैं जिसपर मार्निंग वाक करने के लिए लोग जुट रहे हैं. वालीबाल, बास्केटबाल, बैडमिन्टन जैसे खेलों के लिए सुविधाएं विकसित हुई हैं जहां बच्चे देर शाम तक खेलते हुए मिल जाते हैं. निगम आयुक्त ने दो टूक कहा है कि प्रदूषण जांचने के यंत्र प्रदूषण कम नहीं करते. इसपर पैसे खर्च करने से अच्छा है कि प्रदूषण कम करने के उपाय किये जाएं. एयर क्वालिटी इंडेक्स और स्मोक टावर पर पैसे फूंकने से अच्छा है कि सड़कों पर धूल कम करने के उपाय किये जायें. केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय एयर प्यूरीफायर लगाना चाहता है. एक शहर की आबोहवा को शुद्ध करने के लिए कितने एयर प्यूरीफायर लगेंगे, इसका उसे अंदाजा तक नहीं है. वैसे भी आंकड़े केवल डराने का काम करते हैं जबकि उपाय राहत पहुंचाते हैं. बरसों पहले तत्कालीन साडा अध्यक्ष भजन सिंह निरंकारी ने कोसानाला के संबंध में यही बात कही थी. उन्होंने कहा था कि नाले का पानी कितना गंदा है, लोगों को यह बताने से ज्यादा जरूरी है उन्हें साफ पानी उपलब्ध कराना. फार्मूला तब भी सही था और आज भी है.





