रायपुर। राजधानी के एकमात्र संस्कृत महाविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाए जाने के निर्णय पर विरोध के स्वर उठने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में संस्कृत का प्रचार-प्रसार करने और नि:शुल्क संस्कृत प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने वाली संस्था संस्कृत भारती छत्तीसगढ़ ने इसे गलत निर्णय बताया है। इसके विरोध में संस्कृत भारती के सदस्य अब राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मिलने की तैयारी कर रहे हैं। इन्होंने कहा है कि विकसित देश अमेरिका, रूस, जापान, इंग्लैंड जैसे देश संस्कृत में शिक्षा दे रहे हैं। वहीं अपने यहां इसे मिटाने की तैयारी की जा रही है।

संतों ने जगाई थी संस्कृत की अलख
संस्कृत भारती के महामंत्री डॉ.दादूभाई त्रिपाठी, लक्ष्मीकांत पंडा, प्रवक्ता चंद्रभूषण शुक्ला का कहना है कि पहले ही संस्कृत कॉलेज परिसर के मैदान पर नालंदा लाइब्रेरी का निर्माण कर परिसर को सीमित कर दिया गया है। अब पूरी तरह से संस्कृत की पढ़ाई को खत्म करने का षडय़ंत्र रचा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में संस्कृत भाषा की अलख जगाने में महंत वैष्णवदास, संत गहिरा गुरु, स्वामी आत्मानंद का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
संस्कृत पर आधारित है अनेक भाषा-बोली
छत्तीसगढ़ में हल्बी, गौंडी, मुरिया, सदरी जैसी भाषाओं में 75 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग ने भी इसे स्वीकार किया है कि छत्तीसगढ़ी भाषा में 60 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। संस्कृत महाविद्यालय के आस्तित्व को समाप्त करने की अपेक्षा विश्वविद्यालयों में संस्कृत को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थियों को दंडकारण्य की प्राचीन संस्कृत, इतिहास, पांडुलिपियों की जानकारी मिल सकेगी। यूएसए, यूएई के शिक्षाविदों ने भी माना है कि संस्कृत अन्य भाषाओं की तुलना में 100 प्रतिशत बौद्धिक विकास में सहायक है। संस्कृत भारती के सदस्यों का कहना है कि अमेरिका, जापान, रूस ,इंग्लैंड जैसे उन्न्त देश अपने यहां संस्कृत की शिक्षा दे रहे हैं और यहां छत्तीसगढ़ में एकमात्र संस्कृत महाविद्यालय को अंग्रेजी महाविद्यालय बनाया जा है। अंग्रेजी कालेज कहीं और खोला जाए, लेकिन संस्कृत महाविद्यालय को यथावत रखा जाए।




