-दीपक रंजन दास
राजनीति भी बड़ी कुत्ती चीज होती है, खासकर तब जब एक विशाल जनसमुदाय को हकालना हो. तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं, या यूं कहें अपनाने पड़ते हैं. देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी पर वोट बैंक की राजनीति और तुष्टिकरण के आरोप एक लंबे समय से लग रहे हैं. आरक्षण के खिलाफ भी एक आंधी चली थी. लंबे समय तक लोग कहते रहे हैं कि आरक्षण के बूते डाक्टर बनने वालों से सरकार के मंत्रियों को इलाज कराना चाहिए. अल्पसंख्यकों की धार्मिक यात्रा भी टारगेट में रही है. नीति अब भी वही है बस मोहरे बदल गए हैं. नया मोहरा आदिवासी है. वही आदिवासी जो जंगलों को बचाने की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है. जिसे आजादी के 75 साल बाद भी पेड़ों से चिपककर उनकी सुरक्षा करनी पड़ रही है. वही आदिवासी जो नक्सलियों और सशस्त्र बलों के बीच पिस कर अपना सबकुछ गंवा रहे हैं. ये वही आदिवासी हैं जिनकी परम्पराओं और आस्था पर कुठाराघात किये जा रहे हैं. हसदेव अरण्य और सिलगेर के जंगलों से लेकर ये हमले जामड़ीपाट तक फैले हैं. ये वही आदिवासी हैं जिनकी विधानसभा तक में कथित भद्र लोग खिल्ली उड़ाते हैं. आदिवासी आधुनिक समाज की सोच से परे हैं. वो अपने प्राकृतिक आवासों में, प्रकृति की गोद में, अपनी सीमित जरूरतों के साथ खुश हैं. उनके चेहरों पर आज भी निश्छल हंसी है. पर उन्हें यूं ही तो नहीं छोड़ दिया जा सकता. उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अब तक दो सफल उपाय किये गये हैं. आरक्षण देकर उन्हें आगे बढ़ाने की कोशिशों के बाद उनकी बेहतर शिक्षा दीक्षा के लिए प्रयास किये गये. विभिन्न परीक्षाओं के लिए उन्हें कोचिंग देने की भी व्यवस्था की गई. इसके नतीजे भी आ रहे हैं. आदिवासियों की खेल प्रतिभा को भी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई. आज खेल जगत में भी वे अपना दमखम दिखा रहे हैं. शायद यही सही तरीका भी है जहां उन्हें प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर अपने दमखम के साथ आगे आने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. पर यह एक धीमी प्रक्रिया है जिसका कोई राजनीतिक लाभ सुनिश्चित नहीं है. अब जबकि छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव को लगभग एक साल रह गए हैं 15 साल तक एक ही मुख्यमंत्री के साथ सत्ता में रही पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष आदिवासी मुख्यमंत्री का शिगूफा उछाल रहे हैं. वे कह रहे हैं कि उनकी पार्टी ने एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाया. बता दें – नई राष्ट्रपति ब्रह्मकुमारी हैं. वे आदिवासी जीवन पद्धति से कब का नाता तोड़ चुकी हैं. उन्होंने राष्ट्रपति भवन तक का कायाकल्प अपनी नई आस्था के अनुरूप किया है. क्या आदिवासी मुख्यमंत्री भी ऐसा ही होगा? यहां इस बात की चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि ईसाई बनने के कारण प्रदेश के प्रथम मनोनीत मुख्यमंत्री को आदिवासी मानने से इंकार किया जाता रहा है. उनसे आदिवासी होने के सबूत मांगे जाते रहे हैं.





