-दीपक रंजन दास
जिस देश में भूतकाल की राजनीति हो रही हो वहां यदि एक-आध टीका भूतों को लगा दिया तो इसपर इतना हंगामा क्यों? पूरे देश की राजनीति 100-200 या 500-600 साल पहले हुई घटनाओं पर चल रही है। जिनके दोष गिनाए जा रहे हैं उनकी मौत सैकड़ों साल पहले हो चुकी है। जब उस समय का हिसाब आज तक मांगा जा सकता है तो फिर फकत साल भर पहले मरी हुई महिला को टीका क्यों नहीं लगाया जा सकता? दरअसल, मामला दंतेवाड़ा जिले के कुआकोंडा गांव की शिव देवी सिंह गौतम का है। उसे कोविड का बूस्टर डोज लगाए जाने का दावा स्वास्थ्य विभाग ने किया है। शिव देवी की मौत एक साल पहले हो चुकी है। वैसे यहां यह भी बता दें कि जिस महिला की मौत हुई है उसे कोरोना के दोनों टीके लग चुके थे। पर इसके बाद उसकी मौत हो गई। अब जब बूस्टर डोज लगाने की बारी आई तो विभाग के अधिकारियों ने लिस्ट में उसके नाम के आगे भी निशान लगा दिया। उन्हें क्या पता था कि महिला की मौत हो चुकी है। विभाग पर टीका लगाने का प्रेशर है। उन्हें टारगेट दिया गया है। प्रेशर में अकसर ऐसा हो जाता है। कुछ ऐसा ही प्रेशर देश की सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों पर भी है। उन्हें किसी भी हालत में भूतकाल को जिंदा रखना है। एक से बढ़कर एक इतिहासकार पैदा हो रहे हैं। इन सभी की दिव्य दृष्टि महाभारत के संजय से भी आगे तक जाती है। संजय को केवल वही दिखता था जो उसी समय कहीं और घट रहा हो। वह इसकी रनिंग कमेंट्री दृष्टिबाधित धृतराष्ट्र को सुनाता था। एक और त्रिकालदर्शी हुए हैं लंकापति रावण। उन्हें भी अपना भविष्य ज्यादा दूर तक नहीं दिख पाया। पर कलियुग के त्रिकालदर्शियों की बात ही निराली है। 5-6 सौ साल पहले दफ्न हो चुकी घटनाओं का ये आंखों देखा हाल सुनाते हैं। इन्हें अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं है। इन्हें यकीन है इंटरनेट पर सजाई गई सामग्री पर जिसे लिखने वालों और अपलोड करने वालों में से कई की तो अभी मूंछे भी नहीं फूटीं। आश्चर्य इस बात का है कि जिन दो राज्यों ने विभाजन की त्रासदी झेली है, जिनके पास जातीय दंगों का व्यक्तिगत अनुभव है, वहां हिन्दू-मुसलमान दंगे नहीं होते। चिंगारियां वहां से उठती हैं जहां गंगा-यमुना बहती है। वैसे बता दें कि दंगों का भी एक अपना अर्थशास्त्र होता है। दंगों के दौरान जहां कफन खूब बिकते हैं वहीं दंगों के बाद नवनिर्माण के अवसर भी प्राप्त होते हैं। इस मंथन से सत्ता का अमृतकलश भी निकलता है। पर कराहती है मानवता, छिन्न भिन्न हो जाते हैं सपने, देश पीछे चला जाता है। आपको क्या चाहिए?





