-दीपक रंजन दास
‘सूत न कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा’ की कहावत इन दिनों छत्तीसगढ़ में चरितार्थ हो रही है। प्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉ कृष्णमूर्ति बांधी ने कहा कि सरकार को शराब की जगह भांग और गांजा को बढ़ावा देना चाहिए। शराब पीने से हत्या और बलात्कार के मामले बढ़े हैं, गांजा-भांग पीने वाले ऐसा नहीं करते। मस्तूरी विधायक डॉ. बांधी ने यह बात मध्यप्रदेश के अमरकंटक में चल रहे फूड फेस्टिवल में कही। पेशे से चिकित्सक डॉ बांधी ने कहा कि शराब के कारण बलात्कार, हत्या और झगड़े की प्रवृत्ति बढ़ रही है। शराब बंदी के लिए समितियों को चाहिए कि लोगों को अगर नशा चाहिए, तो ऐसा नशा दो जिसमें हत्याएं न हों, बलात्कार न हों, लड़ाई-झगड़ा न हो। दरअसल डॉ बांधी ने ज्यादा गलत नहीं कहा है। उनसे पहले कांग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर भांग को भारत में वैध किए जाने की पैरवी कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि भांग की पैदावार, भंडारण, परिवहन एवं विक्रय का नियमन कर सरकार इससे मोटी कमाई कर सकती है। औषधि बाजार में भी भांग की जबरदस्त मांग है जिसका लाभ देश को मिल सकता है। बीजू जनता दल (ओडीशा) के तथागत सतपथी 2015 से गांजा-भांग को वैध करने की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि सिगरेट और शराब लॉबी ने मिलकर इसे अवैध घोषित करवाया ताकि नशे के बाजार पर उनका एकछत्र राज रहे। जबकि गांजा और भांग की तुलना में सिगरेट और शराब कहीं ज्यादा खतरनाक हैं। हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में स्वयं केन्द्र सरकार ने कहा है कि गांजा-भांग देश में पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। इसका उत्पादन वैज्ञानिक, चिकित्सकीय, औद्योगिक एवं उद्यानिकी के लिए विशेष अनुमति के साथ किया जा सकता है। पर जैसा की हमेशा होता है, पक्ष-विपक्ष एक दूसरे की बात काटने के लिए पैदा किये गये हैं। मीडिया का एक हिस्सा बिना तथ्यों की तह तक गए नेताओं पर लेबल चस्पा कर देता है। मीडिया कह रहा है कि एक नेता (बांधी) तब ऐसा कह रहा है जब गांजा पर पूरे देश में प्रतिबंध है। भाई साहब! प्रतिबंध है भी तो नेताओं के लगाए ही है, और हटेगा भी तो उन्हीं की कोशिशों से। ऐसे में वह न तो बोले तो कौन बोले? वहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूर्व स्वास्थ्यमंत्री के बयान पर सिर्फ इतना ही कहा कि उन्हें यह प्रस्ताव केन्द्र सरकार के समक्ष रखना चाहिए क्योंकि प्रतिबंध केन्द्र ने लगाया है। वैसे मुख्यमंत्री यह भी कहते हैं कि नशा किसी भी रूप में हो, वह खराब ही होता है। इस बीच दोनों दलों के ठल्ले नेताओं को बैठे-बिठाए नया मुद्दा मिल गया है और एक दूसरे पर खूब हमले किये जा रहे हैं। शराब बंदी का घोषणापत्र धूल फांक रहा है।
गुस्ताखी माफ: चिलम न हुक्का, गांजे पर लट्ठमलट्ठा




