-दीपक रंजन दास
यह एक स्टैंडर्ड जवाब हो गया है – जिम्मेदारों को कुछ पता ही नहीं होता। घटना हो जाती है, सोशल मीडिया में वीडियो वायरल हो जाता है, तस्वीरें चीख-चीख कर गवाही दे रही होती हैं और जिम्मेदारों को कुछ पता ही नहीं होता। यह कोई एक या दो शहरों की बात नहीं है, लगभग पूरे देश का यही हाल है। छत्तीसगढ़ की ही बात करें तो एक इमारत में लिफ्ट हादसा हो जाता है। इसका वीडियो वायरल हो जाता है, खबर अखबारों में भी छप जाती है। वीडियो और फोटोग्राफ्स खुद गवाह हैं कि हादसा हुआ है। खुले दरवाजों के साथ लिफ्ट चल पड़ी है। पर पुलिस मामले में एफआईआर तक नहीं कर पा रही है। कभी वह अस्पताल के रिपोर्ट का इंतजार करती है तो कभी बिजली बोर्ड को चि_ी लिखती है। जबकि इन दोनों का इस हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है। इसी तरह नैला-जांजगीर के नैला सिटी बस टर्मिनल में बदमाश खड़ी बसों के शीशे तोड़ते हैं, सीटें फाड़ते हैं और फिर आग भी लगा देते हैं। आग बुझाने दमकल के वाहन भी आते हैं। पर घटना के 8 दिन बाद नगर पालिका प्रशासन कहता है कि उसे घटना की खबर नहीं है। जांजगीर चांपा के ही स्वामी आत्मानंद स्कूल परिसर में छात्रों के दो गुटों के बीच बेल्ट और लात-घूंसों से जमकर मारपीट होती है। पुलिस कहती है कि उसे कोई शिकायत नहीं मिली है। अब शासन-प्रशासन ही नींद में हो तो क्या किया जाए? लोग कानून को अपने हाथ में तो ले नहीं सकते। ऐसा हुआ तो पुलिस प्रशासन की नींद तत्काल टूटती है। वैसे नींद की भी अपनी क्वालिटी होती है। कुंभकरण को नींद का वरदान प्राप्त था। पर इस नींद से भी उसे जगा लिया गया था। यह और बात है कि यही उसके विनाश का भी कारण बना। पर शासन-प्रशासन की नींद इससे भी उम्दा क्वालिटी की है। इसमें आंखें खुली रहती हैं, चेतना भी जागृत रहती है पर दिखाई सिर्फ वही देता है जो वह देखना चाहता है। वरना सबूतों को प्लेट में सजाकर टेबल पर रख दो तो भी वह दिखाई नहीं देता। वैसे भी सबूत की जरूरत किसे है? यहां तो सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही मकसद है। वह तो सोशल मीडिया पर हो चुका है। अखबार वाले छापें या न छापें – लोगों को तो पता चल ही चुका है। देश में प्रजातंत्र है- प्रजा चाहेगी तो दोबारा ऐसी सरकार को नहीं चुनेगी जो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी न ले। और अगर प्रजा भी सिर्फ हंगामे से संतुष्ट है तो कौन इसमें सिर खपाई करे। सबकी अपनी-अपनी नौकरी और अपना-अपना स्वार्थ है। ज्यादा सोचने से हाइपर टेंशन, डायबिटीज, एसिडिटी हो जाती है।
गुस्ताखी माफ: अच्छा ही है कि कुछ पता नहीं




