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गुस्ताखी माफ: महुआ झरे पर खूब नाचे मंत्री

By @dmin
Published: June 19, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
जीवन है तो कष्ट है। कष्ट को हरने का तरीका भी खुद ही ढूंढ निकालना होता है अन्यथा जीवन नर्क से बदतर हो जाता है। सबका अपना-अपना तरीका है। कोई जिम जाता है, जुम्बा करता है तो कोई पब-क्लब जाकर डांस करता है। वनवासी इतने महंगे शौक नहीं पाल सकते। उनके लिए तो नाच-गाना लाइफ स्टाइल का हिस्सा है। पूजा पाठ, मेला मंडई से लेकर शादी-ब्याह तक जब मौका मिले वे नाच-गा लेते हैं। पेट में थोड़ी सी महुआ शराब पड़ी हो तो माहौल बन ही जाता है। आबकारी मंत्री कवासी लखमा भी ठेठ आदिवासी हैं। विधायक या मंत्री बनकर भी वे अपनी संस्कृति नहीं भूले हैं। जब भी मौका मिलता है झूम कर नाचते हैं। और फिर जब ‘महुआ झरे’ जैसा गीत बज रहा हो तो वो खुद को कैसे रोक सकते हैं। महुआ नाम में ही एक मादकता है। जिसने कभी महुआ का फल नहीं चखा, महुआ की शराब नहीं पी, वह भी खुद को तरन्नुम मे पाता है। ‘महुआ झरे’ के बोल कानों में पड़ते ही लखमा के पांव थिरकने लगे। कुछ ऐसा झूम कर नाचे कि वहां उपस्थित दो विधायक भी खूद को रोक नहीं पाए। उनका मूड कुछ ऐसा बना कि एक विधायक दूसरे विधायक को गोद में लेकर नाचने लगा। वनवासियों के जीवन में वैसे भी ज्यादा कुछ नहीं होता। घर आंगन में एक या दो सल्फी, आसपास कुछ महुआ के पेड़। महुआ के फूलों को वे उबालकर खा लेते हैं। महुआ की शराब बनाने का तो उनके पास बाकायदा लाइसेंस है। वनवासियों के लिए जीवन का मंत्रा ही अलग है। सुबह आंख खुली और जीवन की जद्दोजहद शुरू। शाम तक थक कर चूर हो जाते हैं। थोड़ा नशा करते हैं फिर नाच-गाकर सोने चले जाते हैं। कल की चिंता ये नहीं करते। सुबह आंख खुली तो देखेंगे। इसलिए इनकी लाइफ में टेंशन भी कम है। चेहरे पर हमेशा मुस्कान खिली होती है। ये बीमार भी कम ही पड़ते हैं। बहरहाल, लखमा के डांस का वीडियो हमेशा की तरह वायरल हो गया। लोगों ने खूब चुटकी ली कि विधायक-विधायक को गोद में लेकर नाच रहा है। तो इसमें गलत क्या है? छोटी जगहों के विधायक किसी न किसी की गोद में तो खेलते ही हैं। दिखाई न दे ये और बात है। यह लोकतंत्र है – यदि चुनाव जीतना है तो लाइमलाइट में तो रहना ही होगा। वरना लोग पहचानेंगे कैसे? कोई बिगड़े बोल बोलता है, कोई भरी गर्मी में ‘अग्निपथ’ राग छेड़ता है तो कोई अपने आका की बची खुची आबरू बचाने के लिए जद्दोजहद करता है। लखमा और उनके साथी तो केवल अपनी जिन्दगी जी रहे थे।

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