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हमर दाऊ तो कमाल कर दिस…!, कुर्सी बचाने में रहे सफल, किसानों को साधा, पिता के बयान की गर्मी भी हुई ठंडी

By @dmin
Published: October 9, 2021
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हमर दाऊ तो कमाल कर दिस…!, कुर्सी बचाने में रहे सफल, किसानों को साधा, पिता के बयान की गर्मी भी हुई ठंडी
हमर दाऊ तो कमाल कर दिस…!, कुर्सी बचाने में रहे सफल, किसानों को साधा, पिता के बयान की गर्मी भी हुई ठंडी
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सीएम भूपेश ने एक तीर से साध लिए कई निशाने
भिलाई। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कुर्सी पर गहराया संकट पूरी तरह से खत्म हो गया है। इसके साथ ही यह भी तय हो गया है कि भूपेश अगले चुनाव तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे। यह सब कुछ हुआ है स्वयं सीएम भूपेश के राजनीतिक प्रबंधन और चतुर रणनीतिक कौशल की बदौलत। दरअसल, पंजाब के बाद जिस तरह से न केवल छत्तीसगढ़ अपितु राजस्थान के सीएम की कुर्सियां डोल रही थी, उसके बाद इन राज्यों में कांग्रेस सत्ता और संगठन के अस्थिर होने और टूट का खतरा बढ़ गया था। लेकिन सीएम भूपेश के राजनीतिक चातुर्य ने स्वयं उनकी ही नहीं, राजस्थान के सीएम की कुर्सी को भी बचा लिया। उन्होंने एक तीर से एक साथ कई शिकार किए। इससे उनके राजनीतिक विरोधियों पर भी अंकुश लग गया।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में उबाल मार रहा ढाई साल वाला फार्मूला अब तल पर जा चुका है। इस फार्मूले को लेकर जितनी रस्साकशी हुई, उससे जाहिर है कि विपक्ष को, सरकार को घेरे में लेने का मौका मिल गया। इसी के बाद विधायकों की लामबंदी और दिल्ली दौड़ भी शुरू हुई। हालांकि इसका अंत भी उतना ही रोचक रहा। विधायकों ने जब दूसरी बार दिल्ली की दौड़ लगाई, तब तक पंजाब प्रकरण को लेकर कांग्रेस की नाक बह रही थी। इन विधायकों के अचानक दिल्ली पहुंचने के बाद उनकी बड़े नेताओं से मुलाकात नहीं हो पाई। कई ने तो विधायकों को मिलने का वक्त तक नहीं दिया था। इस वजह से सत्ता से जुड़े लोगों की धड़कनें बढ़ी हुई थी। ठीक ऐसे समय में पार्टी आलाकमान ने सीएम भूपेश बघेल को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का मुख्य पर्यवेक्षक बना दिया। यह इस बात का साफ संकेत था कि विधायक, जिन आशंकाओं को लेकर दिल्ली पहुंचे थे, वह बेमानी थीं। विधायक वापस लौटने लगे तो यूपी में लखीमपुर कांड हो गया। यह कांड भूपेश बघेल के लिए बड़ा अवसर लेकर आया। क्योंकि उन्हें वहां का पर्यवेक्षक बनाया गया था, ऐसे में यूपी पहुंचकर वहां के हालातों का जायजा लेना जरूरी भी था और मजबूरी भी। अवसर तो खैर यह था ही।

राहुल-प्रियंका का मिला साथ
मुख्यमंत्री भूपेश ने इस अवसर को बड़े सुनियोजित तरीके से भुनाया। उन्होंने रायपुर से लखनऊ जाने का मन बनाया तो यूपी प्रशासन ने उन्हें आने से ही मना कर दिया। बावजूद इसके भूपेश लखनऊ पहुंचे तो उन्हें एयरपोर्ट से बाहर निकलने नहीं दिया गया, नतीजतन वे वहीं धरने पर बैठ गए। इस दौरान मोबाइल के जरिए उन्होंने मीडिया से सम्पर्क बनाए रखा। जिससे यूपी सरकार की किरकिरी हुई। तब तक यूपी प्रशासन ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को गिरफ्तार कर लिया था। राहुल गांधी लखीमपुर तक का मार्ग तलाश रहे थे। ऐसे में भूपेश बघेल फिर दिल्ली पहुं्चे और राहुल गांधी के साथ यूपी के लिए वापस रवाना हुए। इससे पहला संदेश यह गया कि उन्हें राहुल गांधी का साथ हासिल है। प्रशासन ने राहुल गांधी और छत्तीसगढ़ व पंजाब के सीएम को लखीमपुर जाने से रोका, हालांकि बाद में इसकी इजाजत दे दी गई। सभी नेता पहले प्रियंका गांधी के पास पहुंचे और फिर उन्हें साथ लेकर लखीमपुर रवाना हुए। इससे दूसरा संदेश यह गया कि प्रियंका गांधी का साथ भी सीएम भूपेश को प्राप्त है।

किसानों को मुआवजा
लखीमपुर में मृत किसान परिवारों से मिलने के बाद सीएम भूपेश ने प्रत्येक मृतक के परिजनों, यहां तक कि मारे गए पत्रकार के परिवार को भी 50-50 लाख रूपए बतौर मुआवजा देने का ऐलान किया। छत्तीसगढ़ के भाजपाई इसे पचा नहीं पाए। हालांकि इसके जरिए भी भूपेश बघेल ने बड़ा दांव खेला। छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने जो नीतियां बनाई और अपनाई, उससे उनकी छवि एक बड़े और निर्विवाद किसान नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुई। ऐसे में मृत किसानों के परिजनों को, छत्तीसगढ़ की सीमा के बाहर जाकर मोटा मुआवजा देने से यूपी में कांग्रेस की साख तो बढ़ी ही, स्वयं भूपेश भी बड़े किसान नेता की अपनी छवि को बनाने और चमकाने में कामयाब रहे। दरअसल, इसके पीछे की एक अन्य वजह उनके पिता नंदकुमार बघेल भी थे, जिन्होंने कुछ समय पहले यूपी जाकर ब्राह्मणों के खिलाफ विवादास्पद ‘गंगा से वोल्गाÓ वाली टिप्पणी की थी। इससे यूपी में पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस के मंसूबों पर गहरा असर पड़ा। यूपी पहुंचने के बाद भूपेश बघेल के कदमों से न केवल कांग्रेस की साख बढ़ी, अपितु नंदकुमार बघेल के बयान की गर्मी भी ठंडी पड़ गई।

अब बदलाव संभव नहीं
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन अब असंभव हो गया है। आलाकमान द्वारा भूपेश बघेल को यूपी चुनाव का मुख्य पर्यवेक्षक बनाया गया है। यूपी में अगले साल फरवरी-मार्च में चुनाव होंगे। तब तक जाहिर है कि उनकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं होगा। मार्च के बाद छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के लिए महज डेढ़ साल का वक्त ही शेष रह जाएगा। ऐसे में आलाकमान के लिए नेतृत्व बदलना बड़ा जोखिम भरा होगा। आलाकमान कभी नहीं चाहेगा कि चुनाव से पहले राज्य में नेतृत्व को लेकर अस्थिरता फैले, जिसका नुकसान चुनाव नतीजों के रूप में सामने आए। इसलिए इस बात की संभावना अब लगभग खत्म हो गई है कि भूपेश बघेल की जगह टीएस बाबा को मिल पाएगी। दिल्ली तक दौड़ लगाने वाले विधायकों को भी यह बात समझ आ गई। यही वजह रही कि किसी वरिष्ठ नेता या आलाकमान से मुलाकात किए बिना ही वे रायपुर वापस लौट आए।

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