श्रीराम कथा के आठवें दिन भरत प्रसंग की कथा, बापू के भजनों में झूमे भक्त
भिलाई। दूसरे धर्म वाले सनातम हिन्दू धर्म से इसलिए जलते हैं क्योंकि उनके पास न तो भगवान का रूप है औऱ् न ही उनके भगवान का अतापता। हिन्दू धर्म में भगवान के हर रूप सुंदर है। इसलिए पूरी दुनिया हिन्दुओं से जलती है। क्योंकि भारत के पास वह खजाना है जिसे पूरी दुनिया लूटना चाहती है। श्रीरामकथा के आठवें दिन खुर्सीपार के दशहरा मैदान में बापू चिन्मायनंद ने कहा कि दूसरे धर्म के लोग परेशान हो गये है। खिसयानी बिल्ली की तरह दूसरे धर्म वाले केवल खंम्भा ही नोच रहे हैं। आदिवासियों को चावल का लोभ देकर क्रास पहनाने की कोशिश तो की, पर सफल नहीं हो पाए। उन्होंने कहा कि एक धर्म में केवल उनके भगवान का एक ही चेहरा है तो दूसरे धर्म के लोगों ने अपने भगवान का चेहरा तक नहीं है। पहले वे कमरे के अंदर से पुकारते थे, लेकिन अब माइक लेकर पुकारते हैं। पर हमारे प्रभु बिना कान के सुनते हैं और बिना हाथ के सब पर आशीर्वाद बनाए रखते हैं और वह है महाप्रभु जगन्नाथ। बापू चिन्मायनंद ने बुधवार को राम भरत मिलन के प्रसंग को सुनाया।


इस अवसर पर मुख्यअतिथि सांसद विजय बघेल, भाजपा जिलाध्यक्ष ब्रिजेश बिचपुरिया, पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय, श्रीरामजन्मोत्सव समिति के जिलाध्यक्ष मनीष पांडेय, पार्षद एवं जीवन आनंद फाउंडेशन के अध्यक्ष विनोद सिंह, संकटा पाठक, तेज बहादूर सिहं, पियुष मिश्रा, बुधन ठाकुर, जोगिंदर शर्मा, बंटी पांडेय, रमेश माने, अजय पाठक, राजेश त्रिपाठी, उमेश मिश्रा, बलविंदर सिहं, आचार्य संदीप तिवारी,अजीत सिंह, प्रकाश यादव, टोपा, श्रीनु, नील मानिकपुरी, शंकर केडिया, पवन भारद्वाज, सोनू शर्मा, आदि मौजूद थे।

कथा से मन का स्नान
बापू चिन्मायनंद ने कहा कि कथा का प्रभाव ऐसा है कि वह सीधे मन को पवित्र करता है। कथा मन का एक तरह का स्नान है जिससे मन निर्मल औऱ स्वच्छ हो जाता है। मन में बुरा विचार नहीं आता। बापू ने कहा कि हमेशा संतों और परमार्थी से ही मार्ग पूछना चाहिए क्योंकि वे सीधा मार्ग बताएंगे, लेकिन स्वार्थी से मार्ग पूछोगे तो वे भटकाएंगे। उन्होंने कहा कि शास्त्रों का साथ भी एक समय के बाद छोड़ देन चाहिए। क्योंकि शास्त्र केवल रास्ता है जबकि मंजिल कही ओर हैं।

भावुक हुए बापू और भक्त
श्रीराम के विरह में राजा दशरथ की मृत्यु , माता कौशल्या की स्थिति और भरत-कैकेई के बीच के संवाद को सुनाते वक्त बापू और भक्त दोनों ही भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि भरत जी ने अपनी माता का त्याग इसलिए कर दिया क्योंकि उन्हें राम प्रिय नहीं थे। बापू ने कहा कि तुलसीदास जी ने भी कहा है कि जिन्हें रामसीता प्रिय नहीं उनका त्याग ही करना अच्छा होता है। उन्होंने कहा कि प्रहलाद ने पिता को छोड़ा, विभिषण ने भाई को छोड़ा, मीरा ने राणा को छोड़ा। इसलिए राम जिन्हें प्रिय है उन्हें ही अपने करीब रखना अच्छा है।
भगवान ने वर्ण बनाया हमें बना दी जातियां
राष्ट्रसंत चिन्मायनंद बापू ने कहा कि भगवान ने हमारे कर्मों के हिसाब से चार वर्णों में बांटा और सबको बराबरी पर रखा, लेकिन हमनें उन वर्णों को जातियों में बांट दिया। उन्होंने कहा कि कर्म केवल हमारे हाथ में है। भगवत गीता में भी भगवान ने कहा कि व्यापार में लाभ या हानि हो इससे टेंशन लेने की जरूरत नहीं आपका काम केवल कर्म करना चाहिए।




