भिलाई। कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि जिले के तीनों नगर निगमों और जामुल पालिका में उसकी सत्ता आने जा रही है। यही वजह है कि महापौर और पालिकाध्यक्ष पदों के लिए चर्चाएं चलने लगी है। हालांकि पार्षदों के बहुमत के बाद ही यह तय होना है कि निकायों का जिम्मा किस पर होगा। भिलाई के बाद सर्वाधिक चर्चा रिसाली नगर निगम को लेकर है। यहां से गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू की बहू सरिता साहू का नाम महापौर पद के लिए तेजी से उभरा है। खबर है कि सरिता साहू तालपुरी वार्ड से चुनाव लडऩे जा रही है। यह वार्ड महिला वर्ग के लिए अनारक्षित है। इस वार्ड में सरिता साहू काफी समय से सक्रिय भी हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान भी उनकी सक्रियता चर्चा में थी।

नवोदित रिसाली नगर निगम में पहली दफा चुनाव होने जा रहा है। यहां कुल 40 वार्ड है। महापौर पद अन्य पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित है। सरिता साहू के नाम की चर्चा इसलिए भी जोरों पर है, क्योंकि गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू का यह न केवल गृह क्षेत्र है, बल्कि उनके निर्वाचन क्षेत्र दुर्ग ग्रामीण का भी हिस्सा है। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान श्री साहू ने क्षेत्र के लोगों से रिसाली क्षेत्र को नगर निगम बनाने का वायदा किया था। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने अपने वायदे को पूरा किया। इसके अलावा उन्होंने इस अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र में बहुतायत विकास कार्य भी करवाए। इससे स्थानीय निवासियों के बीच एक अच्छा संदेश गया है। जिन लोगों को अपने कार्यों के लिए भिलाई निगम की दौड़ लगानी पड़ती थी, उनकी दिक्कतें कम हुई है। जाहिर है कि पहली बार होने जा रहे रिसाली निगम के चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा होगा और कांग्रेस को इसका पूरा-पूरा लाभ भी मिलेगा।
गौरतलब है कि चुनाव तारीखों का ऐलान होने से काफी पहले से ही गृहमंत्री श्री साहू ने चुनावी बागडोर थाम ली थी। प्रदेश में सरकार बनने और क्षेत्रीय विधायक के पास गृह और पीडब्ल्यूडी जैसे प्रभावशाली और महत्वपूर्ण विभाग होने से नागरिकों में वैसे ही उत्साह है। स्थानीय लोगों में यह आस भी जगी है कि अब रिसाली क्षेत्र में विकास के काम रफ्तार पकड़ेंगे। फिलहाल रिसाली निगम क्षेत्र का सियासी पारा चढऩे लगा है। माना जा रहा है कि टिकट के बँटवारे से लेकर महापौर के नाम पर अंतिम मुहर लगाने तक का दारोमदार गृहमंत्री श्री साहू पर ही होगा। यही वजह है कि उनकी बहू सरिता साहू के नाम को लेकर किसी को भी शक की गुंजाइश नहीं है। वैसे भी, सरिता साहू क्षेत्र में विगत करीब एक साल से सक्रिय हैं। जिस तालपुरी वार्ड से उनके चुनाव लडऩे की चर्चा है, वहां महिला दिवस, सम्मान समारोह समेत कई कार्यक्रम करवाए गए।
कांग्रेस को आ रही जीत की महक
शनिवार से चुनाव प्रक्रियाएं शुरू हो गई हैं। मतदान 20 दिसम्बर को होना है और नतीजे 23 दिसम्बर को आएंगे, किन्तु इससे पहले ही कांग्रेस के कार्यकर्ता जीत के दावे करने लगे हैं। इसकी एक प्रमुख वजह यह भी बताई जा रही है कि प्रदेश संगठन ने स्थानीय नेताओं पर भरोसा जताया है। एक ओर जहां रिसाली क्षेत्र में चुनाव की कमान काफी पहले से ही खुद गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू संभाले हुए हैं, वहीं भिलाई में विधायक देवेन्द्र यादव व जिलाध्यक्ष मुकेश चंद्राकर भी अपनी ताकत झोंक रहे हैं। नेता स्वयं परिश्रम करें तो कार्यकर्ताओं का उत्साहित होना लाजिमी है। कांग्रेसियों के उत्साह की एक वजह विपक्षी दल भाजपा में गुटबाजी और जूतमपैजार के हालात भी हैं। हालांकि प्रदेश भाजपा ने स्थानीय दिग्गजों से दूरी बनाकर दीगर क्षेत्रों के नेताओं को चुनावी कमान सौंपी है, लेकिन इससे भाजपाई गुटबाजी पर रोक लगने की संभावना कम ही है।
नहीं मिली कोई जिम्मेदारी
इधर, भाजपा में गुटबाजी को लेकर हालात यह है कि यहां के नेताओं को चुनाव संबंधी कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई है। पार्टी ने निकायवार चुनाव प्रभारियों की घोषणा की तो इसमें जिले के किसी भी नेता का नाम नहीं था। रिसाली निगम के लिए चुनाव प्रभारी धरमलाल कौशिक को बनाया गया था। वहीं भिलाई चरोदा के प्रभारी बृजमोहन अग्रवाल होंगे। भिलाई निगम के प्रभारी राजनांदगांव सांसद संतोष पाण्डेय होंगे। इसके अलावा जामुल पालिका के लिए लाभचंद बाफना को चुनाव प्रभारी बनाया गया है। माना जा रहा है कि स्थानीय गुटबाजी के मद्देनजर प्रदेश नेतृत्व ने यहां के नेताओं को कोई जिम्मेदारी सौंपना मुनासिब नहीं समझा। एक ओर जहां कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर ही टिकट तय कर सिर्फ एक नाम भेजने की स्पष्ट हिदायत दी है, वहीं भाजपा में प्रत्याशियों के नाम तय करने को लेकर कोई स्पष्ट मापदंड नहीं बनाया गया है। वार्ड और बूथ प्रभारियों से जमीनी स्तर पर चर्चा जरूर की जा रही है।
गौरतलब है कि जिले की भाजपाई राजनीति में लम्बे समय से वर्चस्व का संघर्ष चलता रहा है। लम्बे समय तक सरोज पाण्डेय और प्रेमप्रकाश पाण्डेय गुटों के बीच वैमनस्यता रही। आगे चलकर ये दो खेमे तीन और उसके बाद चार गुटों में बँट गए। विजय बघेल के सांसद और विद्यारतन भसीन के विपरीत हालातों में विधायक निर्वाचित होने के बाद पार्टी के भीतर गुटबाजी को और ज्यादा बढ़ावा मिला। विधानसभा चुनाव के पश्चात प्रदेश संगठन को जो रिपोर्ट गई, उसमें जिले में पार्टी की हार की एक वजह गुटबाजी को भी बताया गया था। शायद यही वजह है कि इस नगरीय निकाय चुनाव से जिले के नेताओं को दूर ही रखा गया है। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है, ये नेता पार्टी संगठन की बैठकों से भी दूरी बना रहे हैं।




