भिलाई। भिलाई नगर निगम में कांग्रेस का बहुमत आने के साथ ही अब महापौर की जंग ते•ा हो गई है। महापौर के लिए कांग्रेस में अब तक आधा दर्जन नाम सामने आए हैं। इनमें कई ऐसे पार्षद हैं जो अनुभव के मापदंड़ पर पूरी तरह खरे उतरते हैं तो कई पहली बार निर्वाचित होकर निगम सदन में पहुंचे हैं। भिलाई नगर निगम का इतिहास देखें तो यहां ज्यादातर नए या कम अनुभवी लोग ही महापौर बनते रहे हैं। हालांकि यह तब होता था, जब महापौर का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होता था। इस बार क्योंकि निर्वाचित पार्षदों को ही अपना नेता चुनना है, इसलिए संभावना यही बन रही है कि पार्टी के नेता अनुभव को ज्यादा प्राथमिकता दें। जिन आधा दर्जन नामों की चर्चा महापौर के लिए चल रही है, संभव है कि उन्हीं में से किसी एक को सभापति की कुर्सी भी मिल जाए। इस आधार पर माना जा रहा है कि पार्टी को महापौर और सभापति के लिए एक-एक नाम चुनने में खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। इधर, भाजपा में नेता प्रतिपक्ष के नाम को लेकर भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। इस अहम् जिम्मेदारी के लिए भाजपा के पास अनुभव, आक्रामक और नवनिर्वाचित पार्षदों की संख्या कम नहीं है।

पार्षदों का बहुमत मिलने के बाद अब कांग्रेस के भीतर महापौर के नामों की चर्चाएं जोरों पर है। अनुभव के आधार पर बात करें तो सीजू एंथोनी, नीरज पाल, लक्ष्मीपति राजू व सुभद्रा सिंह के नामों की चर्चा है। वहीं युवा या पहली बार निर्वाचित होने वाले पार्षदों में आदित्य सिंह, एकांश बंछोर व संदीप निरंकारी के नाम सामने आ रहे हैं। सीजू एंथोनी लम्बे समय से नगर निगम में सक्रिय रहे हैं। पार्टी संगठन के कामों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहती आई है। लगातार निर्वाचित होने और जिम्मेदारियों का बेहतर निर्वहन करने के बाद भी उनकी छवि बेदाग नेता की रही है। वहीं नीरज पाल को भी कद्दावर पार्षद के रूप में जाना जाता है। इस चुनाव में पहली बार उनके नाम के साथ वर्मा शब्द देखने को मिला। इसके बाद से ही कयासों का दौर प्रारम्भ हो गया था। पार्टी के भीतर चर्चा है कि भूपेश बघेल सरकार जिस तरह से छत्तीसगढिय़ावाद को लेकर चल रही है, उसी वजह से नीरज पाल को अपने नाम के अंत में वर्मा शब्द जोडऩा पड़ गया। यदि भिलाई महापौर के लिए छत्तीसगढिय़ावाद को आगे बढ़ाया जाएगा तो कुछेक नाम स्वमेव ही कट जाएंगे। फिर उनके लिए सभापति की संभावना ज्यादा बलवती होगी। ऐसे ही एक अन्य नाम लक्ष्मीपति राजू का भी है। लक्ष्मीपति राजू अब तक अपराजेय रहे हैं। पार्षदी का उनके पास खासा अनुभव है। सबसे बड़ी बात यह है कि उनका नाम पार्टी के लिए बेहद भरोसेमंद है। टाउनशिप के अपने वार्ड में उन्होंने जो काम करके दिखाया है, उससे कई पार्षदों को कोफ्त होती रही है।
महापौर के लिए इकलौती महिला के रूप में सुभद्रा सिंह का नाम भी सामने आ रहा है। उल्लेखनीय है कि भिलाई में अब तक हुए कुल 4 चुनाव में दो बार महिला महापौर रह चुकीं है। भिलाई की पहली महिला महापौर बनने का गौरव कांग्रेस की ही नीता लोधी के नाम है। उनके अलावा निर्मला यादव भी कांग्रेस पार्टी से महापौर निर्वाचित हो चुकीं हैं। इस बार यदि महिला कार्ड चला तो सुभद्रा सिंह की दावेदारी पुख्ता है। वैसे भी, उनके अलावा किसी अन्य महिला पार्षद का नाम फिलहाल तो चर्चा में नहीं है। हालांकि पार्टी के भीतर ऐसा भी माना जा रहा है कि उनके नाम पर स्थानीय संगठन व विधायक में एकराय की संभावना कम है। कांग्रेस की टिकट पर पहली बार चुनाव लड़कर जीत हासिल करने वाले एकांश बंछोर व छात्र संगठन एनएसयूआई के अध्यक्ष आदित्य सिंह के नाम युवा पार्षदों में प्रमुखता से लिए जा रहे हैं। इन दोनों को विधायक देवेन्द्र यादव का बेहद करीबी माना जाता है। एकांश बंछोर जहां विधायक देवेन्द्र के प्रतिनिधि हैं, वहीं आदित्य सिंह टीम देवेन्द्र के प्रमुख कर्णधार हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संदीप निरंकारी का नाम भी कई लोगों की जुबान पर है। वे पहली बार चुनाव लड़कर पार्षद निर्वाचित हुए हैं। अपने पिता भजनसिंह निरंकारी की ही तरह वे भी सर्वहारा वर्ग के लिए काम करने को उत्साही रहते हैं।
कांग्रेस के भीतर चर्चा है कि इन्हीं नामों में से किसी एक को सभापति भी बनाया जा सकता है। इस बात की संभावना बेहद कम है कि किसी युवा अथवा पहली बार निर्वाचित पार्षद को सभापति का ताज पहनाया जाए। दरअसल, सभापति का पद बेहद जिम्मेदारी भरा होता है और इसके लिए सदन का अनुभव भी जरूरी है। इस आधार पर माना जा रहा है कि किसी गैर छत्तीसगढिय़ा अनुभवी पार्षद को यह कुर्सी दी जा सकती है। यदि सीजू एंथोनी या लक्ष्मीपति राजू के नाम पर महापौर के लिए सहमति नहीं बन पाई तो संभव है कि इन दोनों में से ही किसी को सभापति बनाया जाए। हालांकि फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबादी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महापौर और सभापति पद के लिए जितने भी नाम सामने आए हैं, उनमें, युवा, अनुभवी, महिला और सामंजस्य वाले पार्षदों के नाम शामिल हैं। लोकतंत्र के लिहाज से इसे अच्छा और शुभ संकेत माना जाता है।

नेता प्रतिपक्ष के लिए भी कई नाम
एक ओर जहां सत्तारूढ़ दल में महापौर और सभापति के नाम तय करने की तैयारियां शुरू हो गई है, वहीं दूसरी ओर निगम में विपक्ष का नेता बनने के लिए भी कई दावेदार सामने आए हैं। इनमें सबसे प्रमुख और स्वाभाविक दावेदार रिकेश सेन हैं। वे इस बार लगातार पांचवीं बार निर्वाचित हुए हैं। पिछली परिषद में भी नेता प्रतिपक्ष का दायित्व बखूबी निभा भी चुके है। उनके अलावा एक अन्य अनुभवी पार्षद श्याम सुंदर राव का नाम भी सामने आ रहा है। वे पूर्व में निगम के सभापति रह चुके हैं। सदन में काम करने का अनुभव उनके पास भी कम नहीं है। वहीं वरिष्ठ पार्षदों में पीयूष मिश्रा का नाम भी लिया जा रहा है जो सदन में सदैव मुखर रहे हैं और विपक्ष के पार्षद के रूप में आक्रामक और सक्रिय राजनीति करने में माहिर हैं। वहीं, पहली बार निर्वाचित होने वाले युवा नेता दया सिंह का नाम भी नेता प्रतिपक्ष के रूप में लिया जा रहा है।




