भिलाई। 2018 में भाजपा में जो आत्मविश्वास था, इस बार वह कहीं नहीं दिखा। यह सत्ता और विपक्ष में रहने का स्पष्ट अंतर है। सत्ता में थे, तब भी हार गए और विपक्ष में हैं, तब भी कुछ नहीं कर पाए। इन दोनों हालातों का बारीकी से मूल्यांकन करें तो स्पष्ट होता है कि अति भी बुरी और दुर्गति उससे भी बुरी। भाजपा के लिए चुनाव के यह नतीजे सिर्फ एक झटका नहीं है। यह पूरी तरह झकझोरने और क्षत-विपक्ष करने वाली स्थिति है। सबसे बुरी बात यह है कि जिन शहरी मतदाताओं पर एकाधिकार की बात भाजपा करती थी, उसने भी साथ छोड़ दिया है। यह काफी कुछ ऐसा है जैसे भयावह बवंडर के गुजर जाने पर तस्वीर उभरती है- सब कुछ खत्म। भाजपा के पास मिशन 2023 के लिए अभी दो साल का वक्त है। यदि वह नए सिरे से और नई शुरूआत करती है तो संभावनाएं अभी भी बची हुई है। लेकिन यदि ढर्रा बरकरार रहा और पुराने चेहरों को तिलांजलि नहीं दी तो दो साल बाद भी यही सब कुछ होगा और पार्टी के पास बजाए सिर धुनने के कुछ नहीं बचेगा।
नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों से कांग्रेस के ताकत मिली है। 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने एक बार फिर से दमदार प्रदर्शन किया है। तीन साल पहले विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की लहर में बीजेपी साफ हो गई है। 90 में से 70 सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की थी। निकाय चुनावों में बीजेपी एक बार फिर से कांग्रेस की आंधी में उड़ गई। तीन साल बाद पार्टी को कतई उम्मीद नहीं थी कि ऐसी हार होगी। इस हार से बीजेपी खेमे के अंदर खलबली मच हुई है। निकायों चुनावों में प्रचंड जीत से कांग्रेस के अंदर भूपेश बघेल को नई शक्ति मिली है। अंदरूनी कलह से जूझ रही कांग्रेस में भूपेश और मजबूत हुए हैं। शहर की सरकार में उन्होंने अपने नेतृत्व का दबादबा एक बार फिर से दिखा दिया है।
15 सालों तक लगातार छत्तीसगढ़ में राज करने बाद बीजेपी की हालत पतली हो गई है। 2018 में करारी हार के बाद लोकसभा चुनाव में जीत मिली थी। इससे बीजेपी को लगा था कि आगे की राह आसान होगी। प्रदेश में हुए उपचुनावों में भी पार्टी को जीत नहीं मिली। नगरीय निकाय चुनाव में बीजेपी की करारी हार हुई है। इससे 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की मुश्किलें बढ़ गई हैं। निकाय चुनाव के नतीजे यह संकेत हैं कि प्रदेश में कांग्रेस की लहर बरकरार है। जमीनी स्तर पर पहले की तुलना में बीजेपी संगठन कमजोर हुआ है। 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में दो उपचुनाव हुए, उनमें भी बीजेपी को हार मिली। साथ ही पार्टी के अंदर चल रही गुटबाजी भी झलककर सामने आती रहती है। कुछ महीने पहले तक प्रदेश में बीजेपी धर्मांतरण के मुद्दे को हवा दे रही थी। उसका बहुत ज्यादा असर नहीं दिखा है। ग्रामीण इलाकों में बीजेपी की पकड़ ढीली हुई है।
काम कर गई दाऊ की नीति
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भूपेश बघेल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने पर जोर दे रहे हैं। साथ ही छत्तीसगढ़ी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भी काम कर रहे हैं। ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने में गोधन न्याय योजना कारगर साबित हुई है। साथ ही स्थानीय उत्पादों को बड़ा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। निकाय चुनावों के जो नतीजे आए हैं, उनमें सिर्फ चार नगर निगम ही शहरी क्षेत्र हैं। बाकी के कस्बाई इलाके हैं।
थमेगी कांग्रेस की अंदरूनी कलह
नगरीय निकाय चुनाव में सत्तारूढ कांग्रेस पार्टी के शानदार परफॉर्मेंस से बीजेपी को तो झटका लगा ही है, कांग्रेस की अंदरूनी कलह पर भी ब्रेक लगने के आसार हैं। ढाई साल के सीएम के कथित फार्मूले को लेकर मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोक रहे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं क्योंकि कांग्रेस आलाकमान से करीबियां बढ़ाने के बाद नगरीय निकाय चुनावों में जीत से भूपेश बघेल को चुनौती देना अब आसान नहीं होगा। करीब चार महीने पहले कांग्रेस की अंदरूनी कलह चरम पर थी। सितंबर महीने में सीएम बघेल की कुर्सी खतरे में दिख रही थी। सीएम पद के लिए ढाई साल के कथित फार्मूले को लेकर स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव लगातार पार्टी नेतृत्व पर दबाव बना रहे थे। आलाकमान के सामने शक्ति प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया था और प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना जोर पकड़ रही थी। नगरीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद बघेल की कुर्सी को खतरे की संभावनाएं खत्म हो गई हैं। यह कयास भी लगने लगे हैं कि सिंहदेव का अगला कदम अब क्या होगा।
18 के बाद हर बार मिली जीत
राज्य में लगातार 15 साल तक सत्ता में रही बीजेपी के लिए नगरीय निकाय चुनावों के नतीजे जोरदार झटके से कम नहीं हैं। 2018 में सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस विधानसभा की तीन सीटों पर हुए उपचुनावों में भी जीत हासिल कर चुकी है। नगरीय निकाय नतीजों के बाद बीजेपी नेता भी मानने लगे हैं कि पार्टी को आत्ममंथन की जरूरत है। पार्टी अब कांग्रेस सरकार के खिलाफ ज्यादा आक्रामक रवैया अपनाने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस इसे अपनी सरकार के कार्यक्रमों और भूपेश बघेल के नेतृत्व की जीत बता रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा है कि बस्तर से लेकर सरगुजा तक लोगों ने पार्टी में विश्वास जताया है। इसका स्पष्ट मतलब है कि लोग कांग्रेस शासन से संतुष्ट हैं।




