-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ की जीवन प्रत्याशा दिल्ली वालों के मुकाबले दस साल कम है। दिल्ली वाले औसतन 75.9 साल तथा छत्तीसगढ़ के लोग औसतन 65.3 साल जीते हैं। बावजूद इसके कि दिल्ली देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। वहां शहरी आबादी छत्तीसगढ़ के मुकाबले कहीं ज्यादा है। इसका मतलब यह भी हुआ कि वहां हाइपरटेंशन, डायबिटीज और गैस्ट्रो के मरीज भी छत्तीसगढ़ से ज्यादा हैं। बावजूद इसके दिल्ली वालों की औसत उम्र छत्तीसगढ़ से बेहतर है। यही आंकड़ों की माया है। आंकड़े पेश करने वाले जो दिखाना चाहते हैं, वही दिखाते हैं। देखने की इच्छा हो तो इसमें और भी बहुत कुछ दिख जाता है। शहरी आबादी को देखें तो छत्तीसगढ़ में अपने आसपास भी 70-75 या 80 साल के लोग आसानी से दिख जाते हैं। पर ग्रामीण और वनवासी आबादी के साथ ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में वनवासियों की बड़ी आबादी है। इनमें अनीमिया, सिकल सेल अनीमिया और थैलेसीमिया के मरीज बड़ी संख्या में है। इनकी जीवन प्रत्याशा बहुत कम होती है। दिल्ली में ऐसी आबादी है ही नहीं, इसलिए उनका औसत नहीं बिगड़ता। जिन्हें लगता है कि देश ने आजादी के 70 सालों में कोई तरक्की नहीं की, यह जानकारी खास उनके लिए है। 1970-75 के बीच देश की औसत जीवन प्रत्याशा 49.7 वर्ष थी। इससे पहले यह और भी कम थी। शादियां जल्दी होती थीं, बच्चे खूब पैदा किये जाते थे पर जीवन प्रत्याशा कम थी और आबादी भी। देश ने प्रगति की, कुपोषण के खिलाफ लड़ाई छेड़ी, चिकित्सा सेवाओं में इजाफा किया। मातृ-शिशु मृत्यु दर कम हुई, जीवन स्तर ऊपर उठा, बीमारियों से मरने वालों की भी संख्या कम हुई। 1990 के दशक तक आते-आते शादी की उम्र आगे खिसक गई, बच्चे एक या दो होने लगे। बावजूद इसके आज देश की आबादी 140 करोड़ के करीब है। यह फकत गाल बजाने का नतीजा नहीं है।
बात का बतंगढ़: दिल्ली वालों से कम जीते हैं छत्तीसगढ़ के लोग




