अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस की संध्या पर आयोजित एक संगीत संध्या में सुनी हुई बात दिल को छू गई. खिटपिट से टूटते रिश्ते, बिखरते परिवार और टूटते याराना पर उन्होंने एक टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि फर्क इससे नहीं पड़ता कि समस्या का समाधान कैसे होगा. फर्क इससे भी नहीं पड़ता कि समस्या का हल कौन निकालेगा. फर्क तो इससे पड़ता है कि समस्या के समाधान के लिए पहल कौन करता है. सही भी है. चारों तरफ अफरातफरी का माहौल है. लोग खुद ही सोच लेते हैं कि उनकी बातों की आगे क्या प्रतिक्रिया होगी. कौन हां कहेगा. किससे ना सुनने को मिलेगी. इस तरह वे उस व्यक्ति के अधिकार का अतिक्रमण करते हैं जो सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए पूरी तरह से तैयार था. जब यही प्रक्रिया घर के भीतर या रिश्तों के बीच अपनाई जाती है तो अच्छे खासे चल रहे रिश्ते भी चटक जाते हैं. संस्थागत परेशानियों की बात करें तो पूर्वाग्रह यहां भी हमें आगे नहीं बढऩे देता. हम अकसर उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते, जो हमारे लिए तय था. वजह यही है कि हम किसी को पनपता हुआ नहीं देख पाते. यहां पेड़ों से सीख लेने की जरूरत है. यदि पेड़ जड़ों को आगे बढऩे से रोकें तो क्या होगा? जड़ें गहराई तक जाएंगी तभी पेड़ ऊंचा उठ पाएगा. यदि जड़ों को गमले में बांध दिया गया तो पेड़ भी बौने होकर ही रह जाते हैं. देश की अधिकांश संस्थाएं आज इसी रोग की गिरफ्त में हैं. छोटी-छोटी इकाइयां अपने मातहत काम कर रहे लोगों की भर्ती तो उनके गुण दोष और उपलब्धियां देखकर करती हैं पर फिर उन्हें एक ऐसे तंग घेरे में कैद कर देती हैं कि वे अपना हंड्रेड परसेन्ट तो क्या फिफ्टी परसेन्ट भी परफारमेन्स नहीं दिखा पाते. जाहिर है वे परफार्म नहीं करेंगे तो कंपनी की भी अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा. हम मशीनों से तो उनकी फुल कैपेसिटी में काम लेते हैं पर इंसानों को ऐसी छूट देने में हमें डर लगता है. हमारा यही डर हमें प्रतिस्पर्धी बनने से रोकता है. हमारे पास टीम तो होती है पर वह इतने नियंत्रण में होती है कि अपना स्वाभाविक प्रदर्शन नहीं कर पाती. दरअसल, यह पूरा गणित संवाद कला पर टिका हुआ है. स्कूलों में बच्चों को कविता पाठ, भाषण और वाद-विवाद के जरिए वाककला में निपुण बनाने की कोशिशें की जाती हैं. पर जैसे जैसे बच्चा ऊपर की कक्षाओं की ओर बढ़ता है, उससे हम उसके विकास की यह लाठी छीन लेते हैं. वह किताबों और कापियों में डूबकर रह जाता है. उसे संवाद कला की फिर से याद दिलाई जाती है जब वह अपनी स्नातक स्तर तक की शिक्षा पूरी कर लेता है. परसनालिटी डेवलपमेंट के नाम पर उसे फिर से एक बार स्टेज पर खड़ा कर दिया जाता है. पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. संवाद कला का यही ह्रास उसके जीवन को नष्ट कर देती है.





