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फटकार: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- दिल्ली की जनता परिपक्व लेकिन दोनों सरकारें अपरिपक्व

By @dmin
Published: July 9, 2021
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सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला, समूह की कंपनियों को अंतरिम राहत से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला, समूह की कंपनियों को अंतरिम राहत से इनकार
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नई दिल्ली (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट ने फेसबुक इंडिया के प्रमुख अजीत मोहन मामले में दिए अपने फैसले में पिछले कुछ वर्षों से केंद्र और राज्य स्तर पर दो अलग-अलग राजनीतिक दलों को सत्ता में लाने के लिए दिल्ली के मतदाताओं की प्रशंसा की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए सरकार का कब्जा है लेकिन विधानसभा चुनावों में बहुत ही अलग परिणाम आया। ऐसा दो बार हो चुका है। यह मतदाताओं की परिपक्वता को दर्शाता है। केंद्र में किसी अन्य दल की सरकार सत्ता में है जबकि राज्य में दूसरे को चुना गया क्योंकि भूमिकाएं भिन्न हैं। हालांकि दो चुनी हुई सरकारों के संबंध में वही परिपक्वता गायब है। 

कोर्ट ने कहा है कि दोनों पक्षों से परिपक्वता की दरकार है। परिपक्वता की अनुपस्थिति के कारण दोनों सरकारों के बीच टकराव सी स्थिति बनी रहती है। कोर्ट ने कहा है कि कोई भी शासन मॉडल काम नहीं कर सकता है यदि दोनों पक्षों में से कोई एक का हठी रवैया हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में राज्य और केंद्र सरकारों के बीच लंबी और बार-बार की लड़ाई ने दिल्ली दंगों(वर्ष2020) के परीक्षण के लिए दिल्ली विधानसभा द्वारा गठित शांति और सद्भाव समिति के अच्छे इरादे पर भी छाया डाली है। 

शीर्ष अदालत ने कहा है कि दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच शासकीय मसलों को लेकर अक्सर होने वाले टकराव मुकदमेबाजी के लिए जिम्मेदार रहा है। मिलकर काम करने की बार-बार न्यायिक सलाह  के बावजूद इस मुद्दे पर सफलता नहीं मिल सकी है। 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 188 पन्नों के आदेश में कहा है, ‘हम यह रिकॉर्ड कर सकते हैं कि केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार शासन के मुद्दों पर एक-दूसरे से नजरें मिलाने में असमर्थ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में हर पहलू पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच एक दुर्भाग्यपूर्ण संघर्ष देखा गया है। दिल्ली सरकार जहां अन्य विधानसभा की तरह शक्तियों का प्रयोग करने की मांग कर रही है वहीं केंद्र सरकार उन्हें ऐसा करने देने के लिए तैयार नहीं है।Ó सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही सरकारों के ‘दोषीÓ मानते हुए कहा है कि यह रोजाना का शासन संघर्ष है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि  दिल्ली में शक्तियों के विभाजन की संवैधानिक योजना को मान्यता देनी होगी। उसे अपनी शक्तियों के भीतर काम करने की क्षमता को सीमित करना होगा। जब सरकार चुनी गई तो उसे पता  था कि वे किस लिए चुने जा रहे हैं। न कि वे यह सोचे कि शक्तियों का विभाजन होना चाहिए। दूसरी ओर केंद्र सरकार को एक अलग राजनीतिक व्यवस्था के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है।

सनद रहे कि इस मामले में भी केंद्र सरकार ने अजीत मोहन की याचिका का समर्थन करते हुए दावा किया है कि दिल्ली विधानसभा को दिल्ली दंगों से संबंधित पहलुओं की जांच करने की कोई शक्ति नहीं है क्योंकि यह कानून और व्यवस्था का मुद्दा है। हालांकि दिल्ली सरकार ने दावा किया था कि दिल्ली विधानसभा ऐसा कर सकती है  क्योंकि यह एक सामाजिक सरोकार का मसला है।

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