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गुस्ताखी माफ: स्वस्थ-सामान्य प्रसव और आधुनिक लाइफस्टाइल

By Om Prakash Verma
Published: September 26, 2022
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गुस्ताखी माफ़: रायपुर के 'हैप्पी स्ट्रीट' और भिलाई की 'तफरी'
गुस्ताखी माफ़: रायपुर के 'हैप्पी स्ट्रीट' और भिलाई की 'तफरी'
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-दीपक रंजन दास
स्वस्थ गर्भावस्था, सामान्य प्रसव और मातृ-शिशु स्वास्थ्य हमेशा से शासन की प्राथमिकता रही है. माता का पोषण स्तर सुधारने, गर्भावस्था के दौरान उसकी नियमित जांच करने और सुरक्षित संस्थागत प्रसव कराने की दिशा में अनेक प्रयास किये गये हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019-21 के मुताबिक छत्तीसगढ़ में मातृ मृत्यु दर 159 प्रति लाख है. राज्य में हर साल 18 हजार से ज्यादा नवजात शिशुओं की मौत जन्म के 2 हफ्ते के अंदर और 26 हजार से ज्यादा की मौत एक साल के भीतर हो जाती है. 250 से अधिक बच्चे जन्म से ही हृदय रोगों का शिकार हो जाते हैं. वहीं 13त्न से ज्यादा शिशुओं का वजन जन्म के समय ढाई किलो से भी कम होता है. बच्चों में विभिन्न प्रकार की शारीरिक-मानसिक विकृतियां भी हो रही हैं. हमारा पूरा जोर जहां संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने पर रहा है वहीं विकसित देशों में सुरक्षित मातृत्व प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर है. जिस योग को भारत ने जन्म दिया, उस योग को विकसित देशों ने अपनाया और फायदे में रहे. सामान्य दर्द रहित प्रसव के लिए वहां तरह-तरह के प्रयोग किये जाते हैं. इन्हीं में से एक है योग. यूनाइटेक नेशन्स इंटरनेशनल चिलड्रन्स इमरजेंसी फंड (यूनीसेफ) की मदद से छत्तीसगढ़ ने एक पहल की है. इसके तहत कोंडागांव जिले में एक पाइलट प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है. कोंडागांव के 47 वेलनेस सेंटर में गर्भवती महिलाओं को योग कराया जा रहा है. प्रोजेक्ट के नतीजे अच्छे आने पर इसे प्रदेश के साथ ही देश भर में अपनाया जा सकता है. दरअसल, गर्भस्थ शिशु के विकास के लिए माता-पिता के गुणसूत्रों के अलावा माता का साधारण स्वास्थ्य जिम्मेदार होता है. वहीं सामान्य सुरक्षित प्रसव में माता की शारीरिक संरचना और क्षमता की बड़ी भूमिका होती है. भारतीय जीवन पद्धति में बच्चे दरी पर बैठकर पढ़ते थे. झाड़ू, पोंछा, बर्तन, कपड़ा से लेकर गोबर लिपाई तक का काम उकड़ूं बैठकर किया जाता था. रसोई में नीचे बैठकर काम किया जाता था. पूजा-पाठ और भोजन भी लोग पालथी मारकर करते थे. पर आधुनिकता की अंधी होड़ में यह सब छूट गया. हमने हर काम खड़े-खड़े या कुर्सियों पर बैठकर करना शुरू कर दिया. कूल्हों ने फैलना छोड़ दिया, रीढ़ का लचीलापन भी जाता रहा. फेफड़ों और मांसपेशियों की जोर लगाने की स्वाभाविक क्षमता चली गई. सिजेरियन डिलीवरी के मामले बढऩे लगे. इंतजाम करते-करते सरकार थक गई. डिलीवरी एक बड़ा व्यवसाय बन गया. मजबूर सरकार को ‘आयुष्मान योजना’ निजी अस्पतालों से छीनकर सरकारी अस्पतालों तक सीमित करना पड़ा. पर सरकारी अस्पतालों में इतना इंतजाम कहां? लिहाजा अब महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और सक्षम बनाए रखने की पहल हो रही है. प्राणायाम से जहां उनकी सांस लेने, कुंभक लगाने और जोर लगाने की क्षमता विकसित होगी वहीं आसनों से उसके कूल्हे के जोड़ों का लचीलापन लौट आएगा. काश यह पहल किसी शहर से की जाती जहां लाइफ स्टाइल चौपट हुई पड़ी है.

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