-दीपक रंजन दास
कुछ लोग एकाएक इतना बड़े हो जाते हैं कि अपने संस्कार भूल जाते हैं। पूरे विश्व में अकेला भारत ही ऐसा देश है जहां ईश्वर की आराधना विभिन्न रूपों में की जाती है। यहां प्रत्येक बड़े मंदिर में अनेक छोटे-छोटे मंदिर होते हैं। मंदिर का नामकरण भले ही सबसे बड़े मंदिर के नाम पर किया जाता है पर इससे आलों में बैठे छोटे-छोटे भगवानों और नवग्रहों का महत्व कम नहीं हो जाता। लोग वहां भी पुष्प चढ़ाते हैं, माथा टेकते हैं। सभी स्थानों पर अपनी शक्ति और सामथ्र्य के अनुसार चढ़ावा भी चढ़ाते हैं। दरअसल यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है जिसमें हमें एक बहुत बड़ी सीख सहजता के साथ दी जाती है। इसका केवल एक आशय है कि जीवन में किसी भी वस्तु, व्यक्ति या स्थान को तुच्छ नहीं समझना चाहिए। जीवन में सभी की भूमिका होती है। बिना नाई के पंडित शुद्धिकरण नहीं करा सकता। बिना डोम के अग्निसंस्कार नहीं हो सकता। रातों रात करोड़पति बने लोग अकसर यही भूल जाते हैं। उन्हें लगता है कि बड़े को साध लिया तो छोटों को लतियाया जा सकता है। रावण ने भी किया था, नतीजा भुगत लिया। इतिहास में ऐसे बहुतेरे किस्से मिल जाएंगे जहां असंतुष्टों ने षडय़ंत्र रचकर सबकुछ तबाह कर दिया। राज्य के अन्यान्य स्थानों की तरह दुर्ग जिले में भी कुछ जमीन दलालों ने तेजी से तरक्की कर ली। उन्होंने अपने पेशे को नया नाम भी दे दिया। कोई बिल्डर तो कोई डेवलपर बन बैठा। छत्तीसगढ़ वासियों को अभी इन दोनों ही शब्दों का अर्थ ठीक-ठीक समझ में नहीं आता। इसलिए कारोबार खूब चला। खुद अपनी जमीन की प्लाटिंग करने वाले डेवलपर बन गए। कुछ लोग जमीन हथियाकर भी डेवलपर बने। ऐसे लोग पटवारी से लेकर स्थानीय विधायक तक को सेट करके चलते हैं। उनमें संस्कार शेष हैं। व्यापार की दुनिया में इसे व्यवहार कहा जाता है। इससे न केवल विघ्नहंता खुश रहते हैं बल्कि सबका समय-समय पर सहयोग भी मिलता है। यह सिस्टम में इंजिन ऑयल का काम करता है। सबकुछ आसानी से, बिना किसी बाधा-विघ्न के चलता रहता है। पर कुछ लोग अपनी अकड़ में रहना पसंद करते हैं। वे अपने आका का नाम लेकर लोगों को डराने-धमकाने से भी नहीं चूकते। उन्हें नहीं पता होता कि नेता और बड़े अधिकारी कभी अपनी गर्दन और कलम नहीं फंसाते। आप उनके लिए भीड़ जुटाओ, मंच बनाओ, चुनाव फाइनेंस कर सकते हो पर उनसे उनका राजनीतिक करियर नहीं छीन सकते। जिस भी नेता ने गलत के पक्ष में दबंगई दिखाई, शहर उनकी हालत देख रहा है। नई पीढ़ी कम से कम यह गलती तो नहीं ही करेगी। अब जब मामूली पटवारी दुम ठोंक दे तो सिवा किकियाकर भागने के और कुछ नहीं किया जा सकता।





