-दीपक रंजन दास
वीर रस में कहें तो ‘बर्दाश्त नहीं किया जाएगा’ सुनकर अच्छा लगता है। पर इसी बर्दाश्त को वीरों और समर्थों का आभूषण भी माना गया है। वीर न केवल अपने शरीर पर जख्मों को बर्दाश्त करते हैं बल्कि दोषी को माफ करने की क्षमता भी रखते हैं। पर हवा का रुख बदला हुआ है। अब बर्दाश्त नहीं कर पाना ही वीरता है। लोग एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। कोई किसी की तरक्की से कुढ़ रहा है तो अधिकांश लोग दूसरों की सफलता से जल-भुन रहे हैं। पत्नी का किसी से हंसना-बोलना बर्दाश्त नहीं हुआ तो हत्या कर दी। मां ने नशे के लिए पैसे नहीं दिये तो चाकू से गोद दिया। किसी की लोकप्रियता हजम नहीं हुई तो उसे झूठे मामले में फंसा दिया। हर सवाल का यहां एक ही हल है – आक्रोश, तोड़-फोड़ और मार-काट। वैसे भी आम भारतीय दूसरों को दोषी ठहराने में सिद्धहस्त है। वह खुद कभी कोई गलती नहीं करता। बात सदियों की गुलामी की हो, सड़क हादसे की हो या बढ़ती आबादी की, बलि का बकरा उसके पास रेडी रहता है। कहते हैं स्वस्थ लोकतंत्र में एक चुनी हुई सरकार होती है, एक अपेक्षाकृत कम मतों वाला प्रतिपक्ष होता है, काम करने के लिए एक स्थायी कार्यपालिका होती है और इन सबपर नजर रखने वाला एक चौथा स्तंभ होता है। पर इन दिनों सबकुछ गड्ड-मड्ड हुआ पड़ा है। कार्यपालिका सरकार की बांदी हो गई है। प्रतिपक्ष को सरकार की अच्छी-बुरी सभी बातें बुरी लगती हैं। सरकार अपनी पूरी ताकत प्रतिपक्ष को नेस्तनाबूद करने पर खर्च कर रही है। लिहाजा कार्यपालिका मनमौजी हो गई है। एक काम सरकार का करती है तो दस काम अपने भी करवा लेती है। लाचार सरकार को आंखें बंद करनी ही पड़ती है। पार्टी मलाई कोफ्ते की हो तो पत्रकार भी क्यों छाछ पिये। वह भी इनकी गाड़ी के पीछे लटका हुआ है। जहां-जहां ये जाते हैं, जो-जो दिखाते हैं, वह भी वहीं-वहीं जाता है और वही-वही देखता है। अपने समर्पण की कीमत भी वसूलता है। भाजपा नीत केन्द्र सरकार के बारे में यह कहा जाता है कि वह साम-दाम-दंड-भेद से गैर भाजपाई सरकारों को अस्थिर करती है। इसकी कमजोर कडिय़ों को तोड़कर अपने में मिलाती है और फिर सरकार गिरा देती है। याददाश्त बहुत बुरी न हो तो पाठकों को स्वयं ऐसे अनेक किस्से याद होंगे। पर इस बार केन्द्र का पाला छत्तीसगढ़ से पड़ा है। यहां एक व्यापारी ने कह दिया कि इनकम टैक्स वालों ने सरकार गिराने में उसकी मदद मांगी है तथा सीएम का पद ऑफर किया है। व्यापारी ने इतना बड़ा ऑफर ठुकराया है तो उसकी जरूर कोई वजह होगी। केन्द्र को चाहिए कि उसकी पड़ताल करे। यह छत्तीसगढ़ है – यहां गुरू घासीदास पूजे जाते हैं। प्रभु श्रीराम यहां भगवान होने से पहले भान्जा हैं जिनके पांव घर-घर पूजे जाते हैं।
गुस्ताखी माफ: बर्दाश्त न कर पाने की समस्या




