-दीपक रंजन दास
केन्द्रीय गृहमंत्री ने कहा है कि नक्सलवाद की समस्या चुटकियों में खत्म की जा सकती है. शायद वे सही कह रहे हों. केवल दृष्टिकोण का फर्क ही तो है. गरीब आदमी घुन लगे चावल को फटका मारके, आंखें गड़ाकर घुनैन दानों को अलग करके, शेष चावल का इस्तेमाल करता है. रईस इतनी जहमत नहीं उठाते. वे पूरा का पूरा चावल मवेशियों को डाल देते हैं और नया चावल मंगवा लेते हैं. जो पार्टी आतंकवादियों के सफाए के लिए एक पूरे कौम को दोषी ठहरा सकती है, वह नक्सलियों के सफाए के लिए जंगलों पर बमबारी भी कर सकती है. गेहूं के साथ घुन के पिसने के मुहावरे को चरितार्थ कर भी लिया जाए तो क्या नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा? पिछले कई वर्षों का शोध बताता है कि नक्सलियों के भी स्लीपर सेल होते हैं. शहरों में बड़ी संख्या में उनके सिम्पथाइजर (सहानुभूति रखने वाले) हैं. तो क्या इनको चुटकियों में मारने के लिए शहरों में भी …? एक किस्सा याद आता है – दो-तीन दशक पहले तक दिल्ली-6 के विज्ञापन अखबारों और सस्ती पत्रिकाओं में खूब छपा करते थे. इनमें आग उगलने वाली पिस्तौल, आत्मरक्षा के उपकरण, खटमल मारने की मशीन, सस्ता रेडियो आदि को अविश्वसनीय दामों पर बेचने का दावा किया जाता था. एक सज्जन ने चुटकियों में खटमल मारने की मशीन मंगवा ली. जब वीपीपी (वैल्यू पेड पार्सल) खोला तो उसमें से एक चिमटा, लकड़ी का एक गुटका और एक हथौड़ा निकला. साथ में एक नोट था. खटमलों को मारना बेहद आसान है. खटमल को चिमटे से पकड़ो, उसे लकड़ी के गुटके पर रखो और हथौड़ी की एक चोट से उसका काम तमाम कर दो. यहां महत्व चुटकियों की टाइमिंग का भी है. राज्य गठन के बाद पहली बार कांग्रेस की सरकार चुनी गई है. उससे पहले 15 साल तक यहां भाजपा की ही सरकार रही है. जोगी सरकार को तो गद्दी बंटवारे के तोहफे में मिली थी. भाजपा के 15 सालों के कार्यकाल में से 5 साल ऐसे भी थे जब केन्द्र में भी भाजपा की सरकार थी. पर तब राजनाथ सिंह केन्द्रीय गृहमंत्री के रूप में इस विभाग का कामकाज देख रहे थे. तो क्या उन्हें चुटकी बजानी नहीं आती थी? या वो नहीं चाहते थे कि जंगलों में गेहूं के साथ घुन भी पिस जाए. या फिर शायद दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म-मानववाद में उनकी गहरी आस्था रही हो. वजह चाहे जो भी हो, चुटकियों में नक्सलियों को खत्म करने का दावा या तो केवल चुनावी शिगूफेबाजी है, या फिर क्रूरता की पराकाष्ठा. कोई भी समस्या चुटकियों में तब तक हल नहीं हो सकती, जब तक आपमें मानवीयता के अंश शेष हों. निर्दोषों को बचाते हुए कठोर कार्रवाई करने के लिए रणनीति भी लगती है और वक्त भी. छत्तीसगढ़ के कृषि और पंचायत मंत्री रवीन्द्र चौबे ने ठीक ही सवाल किया है कि यह चुटकी तब क्यों नहीं बजाई गई – जब केन्द्र और राज्य, दोनों जगह भाजपा की सरकारें थीं. क्या लगा था, भाजपा सरकार अमृत पीकर आई है?





