-दीपक रंजन दास
प्रदेश के नब्बे विभागों के चार लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी पिछले एक सप्ताह से हड़ताल पर हैं. वे केन्द्रीय कर्मचारियों के समान 34 प्रतिशत महंगाई भत्ता और गृहभाड़ा भत्ता की मांग कर रहे हैं. प्रदेश में कामकाज ठप है. स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई नहीं हो रही, सरकारी दफ्तरों में काम नहीं हो रहा, अदालती और राजस्व के काम भी रुके हुए हैं. हड़ताल में भाग लेने वाले कर्मचारी संगठनों की संख्या पहले ही सौ का आंकड़ा पार कर चुकी है. इस बीच राज्यपाल ने माननीयों का वेतन-भत्ता बढ़ाने संबंधी संशोधन विधेयक को सोमवार को मंजूरी दे दी. इससे कर्मचारियों की असंतोष की आग में घी पड़ गया है. पारखी नजर रखने वाले वरिष्ठ सरकारी कर्मचारियों ने माननीयों के भत्ते बढ़ाए जाने की गंभीर विवेचना की है. वे कुछ तथ्य भी निकालकर लाए हैं. सरकार के अधिकांश विधायक कुछ नहीं करते पर उनके निर्वाचन क्षेत्र भत्ते में 50 प्रतिशत की वृद्धि की गई है. इसके अलावा मिलने वाले दैनिक भत्ते में भी सौ प्रतिशत का इजाफा किया गया है. पुख्ता स्वास्थ्य व्यवस्था का दावा करने वाली सरकार ने अपने विधायकों के चिकित्सा भत्ता में पचास प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की है. फ्री कॉलिंग के जमाने में टेलीफोन भत्ता में सौ प्रतिशत का इजाफा कर उसे दस हजार रुपए प्रतिमाह कर दिया है. मजे की बात यह है कि किसी का भी वेतन नहीं बढ़ाया गया है. वह बीस हजार का बीस हजार ही है. सभी वृद्धियां भत्तों में की गई हैं. सिर्फ मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष का ही वेतन बढ़ा है. विधानसभा अध्यक्ष का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता चालीस से बढ़कर तिहत्तर हजार और दैनिक भत्ता दो से बढ़कर ढाई हजार हो गया है. इन वृद्धियों के बाद सबसे ज्यादा दो लाख तीस हजार रुपए प्रतिमाह मुख्यमंत्री के बनेंगे और दो लाख बीस हजार रुपए विधानसभा अध्यक्ष को मिलेंगे. माननीयों के भत्तों में पचास-पचास और सौ-सौ प्रतिशत की वृद्धि ने शासकीय कर्मचारियों के जले पर नमक छिड़का है. पर यह केवल आधा सच है. सरकारी कर्मचारी एक बार चुने जाने के बाद 25 से 35 साल का कार्यकाल पूरा करते हैं. उनका भविष्य सुरक्षित रहता है. जबकि विधायक केवल पांच साल के लिए चुने जाते हैं. ऊपर से उन्हें बहुत ज्यादा यात्राएं करनी पड़ती हैं, प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को चाय पिलानी पड़ती है, सीजन में प्रतिदिन पांच-सात शादियों में जाना पड़ता है. चंदा देना पड़ता है. यह भत्ता उसके मुकाबले कुछ भी नहीं है. इसकी तुलना सरकारी कर्मचारियों के वेतन भत्ते से नहीं की जा सकती. वैसे भी छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियम 1965 के तहत एक साथ हड़ताल करना छुट्टी लेना अनुशासनहीनता है. ऐसा करने पर न तो छुट्टी दी जाएगी न ही हड़ताल के दिनों का कोई वेतन मिलेगा.





