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ओबीसी का पूरा कुनबा समेटने में जुटे छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी रणनीतिकार, कांग्रेस का ‘यादव’ चेहरा बने देवेन्द्र

By @dmin
Published: October 7, 2021
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The MLA wrote a letter to the Collector: This thing about the salary of contract workers being quarantined
The MLA wrote a letter to the Collector: This thing about the salary of contract workers being quarantined
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एक-एक कर भाजपाई वोट-बैंक पर हाथ साफ कर रही कांग्रेस
भिलाई। छत्तीसगढ़ के 47 फीसदी ओबीसी वोट कबाडऩे के लिए कांग्रेस ने जबरदस्त व्यूह तैयार किया है। एक ओर जहां भाजपा बस्तर में चिंतन शिविर रखकर आदिवासी वोटों को फिर से अपने पाले में करने में जुटी है तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस एक-एक कर भाजपाई वोट-बैंक पर सेंधमारी कर रही है। पिछले चुनाव के नतीजे बताते हैं कि एससी और एसटी वोटर्स भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस के पक्ष में जुटे थे, जबकि ओबीसी वोटों का कुछ हद तक विभाजन हुआ था। इसी के मद्देनजर कांग्रेसी रणनीतिकारों ने अब अपना पूरा ध्यान सबसे बड़े वोटबैंक ओबीसी पर केन्द्रित किया है। साहू-कुर्मी के बाद यादव वोट कांग्रेस के निशाने पर हैं। सर्व यादव यहां तीसरा सबसे बड़ा वोट-बैंक है।

अब तक भाजपा के पक्षधर रहे यादव वोटर, कभी कांग्रेस की कमजोर कड़ी माने जाते थे। लेकिन राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद अब कांग्रेस कमजोरियों को दूर करने की रणनीाति बनाने में जुटी है। सर्व यादव समाज की बात करें तो छत्तीसगढ़ में वे करीब 9 फीसदी हैं। जहां पिछले विधानसभा चुनाव में एक भी यादव विधायक नहीं था, वहीं इस बार 3 यादव विधानसभा पहुंचे हैं। मजे की बात है कि ये तीनों विधायक कांग्रेस से ही हैं। चंद्रपुर से रामकुमार यादव, खल्लारी से द्वारिकाधीश यादव व भिलाई से देवेन्द्र यादव के नाम इनमें शामिल हैं। यही वजह है कि भाजपाई समर्थन वाले यादव नेतृत्व (संगठनों, नेताओं) को चुनौती देते हुए कांग्रेस नया यादव नेतृत्व उभारने में जुटी है। इसमें सबसे प्रमुख चेहरा भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव हैं। दरअसल, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेहद करीबी लोगों में शुमार देवेन्द्र, छात्र राजनीति के जरिए कांग्रेस में आए थे और धीरे-धीरे अपना जनाधार न केवल दुर्ग जिले अपितु पूरे छत्तीसगढ़ में बढ़ाया। वे छात्र संगठन के राष्ट्रीय सचिव भी रहे। जिस तरह से उन्होंने पहले भिलाई में महापौर और उसके बाद कद्दावर भाजपा नेता व मंत्री को विधानसभा चुनाव हराकर जीत हासिल की, उसके बाद उनका कद बढ़ाया जाना भी लाजिमी है।

देवेन्द्र में दिखी संभावनाएं
जानकारों के मुताबिक, कांग्रेसी रणनीतिकारों को देवेन्द्र यादव में काफी संभावनाएं दिख रही है। यही वजह है कि उन्हें छत्तीसगढ़ में बड़े यादव चेहरे के रूप में सामने लाने की रणनीति बनाई गई है। कुछ समय पहले तक न केवल दुर्ग जिला बल्कि छत्तीसगढ़ में हेमचंद यादव को बड़ा यादव चेहरा माना जाता था। उनके निधन के पश्चात यादवों को राजनीतिक दृष्टि से भी बड़े यादव चेहरे की दरकार थी। यही वजह है कि पिछले साल सभी फिरकों के यादव-प्रमुखों को एकजुट करने की कोशिशें ते•ा हुई। एक केन्द्रीय समिति बनाने का निर्णय लिया गया। एक यादव-एक समाज को प्रोत्साहित किया गया। कुल मिलाकर सभी तरह के यादवों को एक छत के नीचे लाया गया। कांग्रेसी रणनीतिकारों के कान खड़े करने के लिए यह काफी था। दरअसल, कांग्रेसियों को इसमें भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग न•ार आई, जो भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकती है। इसलिए, पार्टी ने नए यादव नेतृत्व के रूप में देवेन्द्र यादव के नाम चला दिया।

सर्वमान्य युवा नेता हैं देवेन्द्र
भिलाई जैसे बड़े शहर में महापौर चुनाव खासे अंतर से जीतने वाले देवेन्द्र यादव ने जिस अंदाज में विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीता, उसके बाद पार्टी को यह भरोसा हो गया है कि देवेन्द्र क्षेत्र में सर्वमान्य नेता हैं। वर्तमान में जिले की कांग्रेसी राजनीति में उनकी अच्छी दखल है। बावजूद इसके कि यह मुख्यमंत्री और गृहमंत्री का गृहजिला है। उनके पास युवाओं की एक बड़ी फौज है। चुनाव जीतने के बाद आमजन को भूल जाने वाले नेताओं के विपरीत देवेन्द्र ने जन-सरोकार की राजनीति का रास्ता अपनाया। घर पर बैठकर दरबार लगाने की बजाए जमीनी स्तर पर काम करने से उनकी एक अलग पहचान बनी। तफरीह जैसे आयोजनों के जरिए उन्होंने भिलाई के लोगों का दिल जीत लिया। आज भी वे यूं ही भ्रमण पर निकल पड़ते हैं, ताकि आम लोगों, मजदूरों, व्यापारियों के जरिए क्षेत्र की समस्याओं से रू-ब-रू हुआ जा सके। भले ही देवेन्द्र यादव पहली बार विधायक निर्वाचित हुए हों, किन्तु वर्तमान में उनकी पहचान एक कद्दावर युवा नेता के रूप में है।

बड़ा वोट-बैंक हैं यादव
सामाजिक सूत्रों के मुताबिक, राज्य में सर्व यादवों की आबादी करीब 25 लाख है। 47 फीसदी ओबीसी में वे भी शामिल हैं। उनकी हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी है। ओबीसी के अंतर्गत 95 के आसपास जातियां व उपजातियां शामिल हैं। इनमें सबसे बड़ा जाति समूह साहू समाज का है। साहू करीब 12 फीसद हैं, जबकि 9 फीसद यादव, 5 फीसद मरार, निषाद व कुर्मी (अपुष्ट) हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद साहू समाज भाजपा के पाले में चला गया था, किन्तु विगत चुनाव में साहू वोट-बैंक का रूख कांग्रेस की ओर मोड़ दिया गया। इससे कांग्रेस का पलड़ा अचानक से भारी हो गया। जानकारों के मुताबिक, अब कांग्रेस ओबीसी की अन्य जातियों-समाजों को भी अपने पक्ष करने में जुट गई है, ताकि अगले चुनाव से पहले तक राजनीतिक नियंत्रण अपने हाथ में किया जा सके। कुर्मी, क्योंकि पहले से ही कांग्रेस के साथ हैं, इसलिए यादवों के पश्चात अन्य छोटे समाजों की बारी आएगी।

मैदानी राजनीति पर होगा असर
पृथक राज्य बनने के बाद से लेकर अब तक राजनीतिक दलों का पूरा ध्यान पहाड़ी क्षेत्रों की ओर ही रहा है, जबकि मैदानी इलाके चुनाव के नतीजे तय करने में बड़ा फैक्टर साबित होते रहे। यही वजह है कि कांग्रेस ने मैदानी इलाकों को प्राथमिकता में लिया। साहू-कर्मी के बाद अब यादव समाज के जरिए मैदानी इलाकों पर फोकस किया जा रहा है। जानकारियों के मुताबिक, राज्य के दुर्ग, बिलासपुर, रायपुर, कोरबा, राजनांदगांव व बस्तर आदि क्षेत्रों में यादवों की बहुलता है। राज्य बनने से पहले डॉ. मन्नूलाल यदु पिछड़ा वर्ग के बड़े नेता माने जाते थे। उनके पश्चात हेमचंद यादव सर्वमान्य व निर्णायक भूमिका में रहे। चुनाव में पराजय के बाद उनका सामाजिक व राजनीतिक कद घट गया, जिसके बाद समाज के भीतर नए राजनीतिक नेतृत्व की तलाश शुरू हुई। यह विडंबना थी कि 2013 में एक भी यादव, विधानसभा नहीं पहुंच पाया। 11 सीटों वाले छत्तीसगढ़ में एक भी सांसद यादव नहीं है। अलबत्ता, इस बार 3 यादव विधानसभा में हैं।

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