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राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारतीय भाषाएं

By Om Prakash Verma Published February 24, 2025
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को 29 जुलाई, 2020 को लागू किया गया था. यह नीति 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति की जगह लेती है. तमिलनाडु ने इसके भाषाई प्रावधान का विरोध करते हुए इस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया है. इसी आधार पर केन्द्र ने तमिलनाडु के 2400 करोड़ रुपए रोक दिये हैं. तमिलनाडु ने इसके विरोध में रेलवे स्टेशन पर हिन्दी में लिखे नामों पर कालिख लगाना शुरू कर दिया है. तमिलनाडु की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को देश में दूसरा सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. इसकी पुष्टि स्वयं भारत सरकार के इकोनोमिकल सर्वे की रिपोर्ट करती है. दरअसल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति खुद हंसी का पात्र बनी हुई है. इसपर बैठकें ही ज्यादा हो रही हैं, धरातल पर दिखाई कम ही देता है. उच्च शिक्षा संस्थान अभी भी इसे समझने की ही कोशिश कर रहे हैं. संक्षेप में इसे एनईपी कहते हैं. ‘एन’ अक्षर से कोई नेशनल समझता है तो कोई ‘न्यू’. इसलिए कोई इसे राष्ट्रीय तो कोई नई शिक्षा नीति कहता है. स्कूली शिक्षा की बात करें तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत, विद्यार्थी को 3 भाषाएं सीखनी होंगी. राज्य और स्कूल तय करेंगे कि वे कौन-सी 3 भाषाएं पढ़ाएंगे. प्राइमरी में पढ़ाई मातृभाषा या स्थानीय भाषा में करने की सिफारिश की गई है. मिडिल में 3 भाषाओं की पढ़ाई अनिवार्य है. सेकेंड्री में स्कूल चाहें तो विदेशी भाषा भी पढ़ा सकेंगे. भारतीय भाषाएं पहले ही अंतिम सांसें गिन रही हैं. कोई भी भाषा शुद्ध नहीं रह गई है. सोशल मीडिया युग में तो खुद भाषा को ही खतरा पैदा हो गया है. भावनाओं की जगह इमोजी ने ले ली है. अंग्रेजी के छोटे-छोटे शब्द भी अक्षरों में बदल रहे हैं. चिट्ठी-पत्री लिखना तो कब का बंद हो चुका है. लोग देश विदेश के किसी भी कोने में रह रहे अपने परिजनों से व्हाट्सअप कॉल पर सीधे बात कर लेते हैं. इसलिए शिष्टाचार के शब्द भी विलुप्ति की कगार पर हैं. हिन्दी पट्टी की तो मौलिक भाषाएं ही गुमनामी के अंधेरों में खो गई हैं. इनका एकमात्र कसूर यह था कि ये हिन्दी से मिलती जुलती थीं. दूसरे राज्यों या महानगरों में जा बसे लोगों के बच्चे अपनी मातृभाषा बोल और समझ तो लेते हैं पर उन्हें लिख-पढ़ नहीं सकते. अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने वाले हिन्दी की गिनती नहीं समझते. अभिभावकों को इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता. करियर के लिए यह जरूरी भी नहीं. स्वदेश में नौकरी करने के लिए जहां हिन्दी और अंग्रेजी की अच्छी जानकारी काफी है वहीं विदेशों में जा बसने की इच्छा रखने वाले अंग्रेजी को ही प्राथमिकता देते हैं. वो घर पर भी अंग्रेजी ही बोलते हैं. उनके बच्चे अंग्रेजी फिल्में और सिरीज देखते हैं ताकि उच्चारण को बेहतर बनाया जा सके. यह बेहतर रोजगार के लिए जरूरी भी है. जिसे पुश्तैनी व्यवसाय को अपनाना होता है, वह इसे अपने घर पर ही बाप-दादा, चाचा-ताऊ से सीख लेता है.

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Om Prakash Verma February 24, 2025
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