भिलाई। जिले के 4 निकायों में होने जा रहे स्थानीय चुनाव ने राजनीतिक दलों के पसीने छुड़ा दिए हैं। इन निकायों में टिकट नहीं मिलने की नाराजगी नामांकन दाखिले के रूप में सामने आई है। भाजपा और कांग्रेस दोनों बगावत से इनकार कर रहे हैं, किन्तु वार्डों में जिस तरह से बड़ी संख्या में नामांकन दाखिल किए गए हैं, उसने बड़े नेताओं की चिंता बढ़ा दी है। बागियों को मनाने का एक दौर कामयाब नहीं हो पाया है। बड़े नेताओं के मान-मनौव्वल को ठुकराकर बागी चुनाव लडऩे पर आमादा है। यह भी खबर आ रही है कि बागियों को नाम वापस लेने के ऐवज में एल्डरमैन बनाने और संगठन में पद देने का प्रलोभन दिया जा रहा है। नाम वापसी का कल 6 दिसम्बर को अंतिम दिन है। इधर, प्रत्येक बागी को यह लग रहा है कि वह चुनाव जीत रहा है। यही वजह है कि वे अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ नाम वापस लेने को तैयार नहीं है। बगावत की बड़ी वजह राजनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ ही टिकट वितरण में गड़बड़ी भी है। दोनों ही दलों पर बड़ी संख्या में पैराशूट प्रत्याशी उतारने के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय कार्यकर्ता इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
वार्डों के परिसीमन के चलते और कई बड़े व प्रभावशाली नामों को दीगर वार्डों में अडजस्ट करने की वजह से बड़ी संख्या में स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हुई है। राजनीतिक दल इसे स्वीकार भी कर रहे हैं। दरअसल, विगत चुनाव में वार्डों का जो आकार-प्रकार था, उसमें परिसीमन के बाद घट-बढ़ हुई है, इसके चलते वार्ड में नए जुड़े क्षेत्र से दिए गए प्रत्याशी को भी कार्यकर्ता बाहरी बता रहे हैं। वहीं प्रभावशाली नेताओं व निवृत्तमान पार्षदों को आस-पास के वार्डों से टिकट देने का आक्रोश भी कार्यकर्ताओं में है। यही वजह है कि टिकट वितरण में गड़बड़ी और स्वयं की अनदेखी का आरोप लगाकर बड़ी संख्या में कार्यकर्ता चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं। भिलाई नगर क्षेत्र के कुल 70 वार्डों में 435 प्रत्याशी (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक) मैदान में थे। इनमें दोनों दलों के 70-70 प्रत्याशी को घटा दें तो भी निर्दलीय व बागी मिलाकर 265 अतिरिक्त प्रत्याशी मैदान में है। इन्हें मिलने वाले वोटों से ही दलीय प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा। यही वजह है कि निचले स्तर पर मान-मनौव्वल की कोशिशें नाकाम होने के बाद अब बागियों को मनाने का जिम्मा बड़े नेताओं ने लिया है। एक ओर जहां भिलाई निगम पर कब्जे के लिए कांग्रेस ने बेहतर व्यूह रचा है, वहीं भाजपा ने भी इस बार टिकट का वितरण परंपरा और लीक से हटकर किया है। इसे कांग्रेस के छत्तीसगढिय़ा कार्ड का ही असर कहा जा सकता है। लेकिन कार्यकर्ता इस उच्चस्तरीय राजनीतिक प्रक्रिया का आंकलन अपने हिसाब से कर रहे हैं। यह सच है कि टिकट वितरण के दौरान खासकर भाजपा में गुटबाजी हावी रही है और चारों निकायों में भाजपा के एक गुट विशेष की ही चली है। बागियों की संख्या बढऩे की एक वजह यह भी है।
चरोदा नगर निगम की बात करें तो यहां 40 वार्डों के लिए 170 प्रत्याशी मैदान में है, जिनमें से 90 निर्दलीय और बागी है। यहां कांग्रेस की अपेक्षा भाजपा के कार्यकर्ताओं में ज्यादा नाराजगी है। कार्यकर्ता कथित आपराधिक पृष्ठभूमि वाले, पैराशूट प्रत्याशी और अनाम लोगों को टिकट देने पर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि इस निगम पर पहली बार उसका कब्जा होने जा रहा है। रिसाली नगर निगम क्षेत्र के 40 वार्डों के लिए 202 नामांकन हुए हैं। इस आधार पर यहां कुल 122 निर्दलीय व बागी प्रत्याशी मैदान में हैं। वहीं जामुल पालिका क्षेत्र के 20 वार्डों के लिए कुल 62 निर्दलीय अथवा बागियों ने खम ठोंका है।
कल स्पष्ट होगी तस्वीर
नाम वापसी का कल 6 दिसम्बर को अंतिम दिन है। इसके बाद ही वार्डों की तस्वीर स्पष्ट हो पाएगी। फिलहाल हालात यह हैं कि बागी उम्मीदवार अपना नाम वापस लेने को तैयार नहीं है। बताया जा रहा है कि नामचीन प्रत्याशियों के खिलाफ उतरने वाले कई बागी भूमिगत हो गए हैं। इन बागियों की खोजबीन अधिकृत प्रत्याशी के लोगों के साथ ही बड़े नेताओं के समर्थक भी कर रहे हैं। कई बागियों के घर देर रात छापामार कार्रवाई भी की जा रही है। हालांकि यह भी खबर है कि कई कार्यकताओं ने तात्कालिक नाराजगी के चलते नामांकन फार्म जमा कर दिया था, अब ऐसे लोग वरिष्ठ नेताओं से बातचीत कर नाम वापस लेने को तैयार हैं, लेकिन वे इसकी ऐवज में सत्ता अथवा संगठन में अपनी भूमिका चाह रहे हैं।




