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पराली/फसल अवशेष के विद्युत संयंत्रों में उपयोग पर किसानों का एक दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम

By @dmin Published May 14, 2022
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दुर्ग। नेशनल मिशन बायोमास (समर्थ) द्वारा दाऊ वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, अंजोरा एवं नेशनल पावर प्रशिक्षण संस्थान, नागपुर के सौजन्य से पराली/फसल अवशेष के विद्युत संयंत्रों में उपयोग पर किसानों हेतु एक दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.एन.पी. दक्षिणकर के मुख्य आतिथ्य, डॉ.आर.पी.तिवारी निदेशक विस्तार शिक्षा की अध्यक्षता, सुदीप नाग, मिशन डायरेक्टर, नेशनल मिशन- बायोमास (समर्थ), डॉ. मंजू मैम, प्रधान निदेशक, नेशनल पावर प्रशिक्षण संस्थान, फरीदाबाद, श्रीमती शालिनी यादव अध्यक्ष जिला पंचायत दुर्ग, श्रीमती संगीता साहू सरपंच ग्राम पंचायत अंजोरा निजामुद्दीन अतिरिक्त महाप्रबंधक प्रखर मालवीय सीनियर मैनेजर तकनीकी सेवाएं नेशनल मिशन बायोमास समर्थ के विशिष्ट आतिथ्य एवं 80 कृषकों की सहभागिता तथा कृषि विज्ञान केंद्र के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. विकास खुणे, डॉ.निशा शर्मा, विषय वस्तु विशेषज्ञ, डॉ. दिलीप चौधरी विश्वविद्यालय जनसंपर्क अधिकारी की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

कुलपति डॉ. एन.पी.दक्षिणकर ने किसानों को इस मंच से आह्वान करते हुए कहा कि वह स्व-सहायता समूह के माध्यम से गौठानों में बायोफ्यूल, बायोकोल बनाऐ। कृषक भाई एक सामूहिक प्रयास करके अपने आय में वृद्धि कर सकते हैं। पराली के जलने से मिथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे गैसों का उत्सर्जन होता है, जहरीले धुएं की वजह से फेफड़े की समस्या, सांस लेने में तकलीफ, कैंसर समेत अन्य रोग होने का खतरा भी बढ़ जाता है। हवा में धूल के कण और अन्य प्रदूषित गैस होती है, ठंड में यह सब तत्व कोहरे में मिलकर काफी नीचे आ जाते हैं अगर इस समय कोई व्यक्ति सुबह सैर के लिए निकलता है या दौड़ लगाता है तो यह प्रदूषित तत्व व गैसें श्वांस से फेफड़ों तक पहुंच जाती हैं, इससे अस्थमा और श्वास की बीमारी होने की संभावनाएं काफी बढ़ जाती है ऐसे में जो पहले से इस बीमारी से पीडि़त है उन पर इसके काफी गंभीर परिणाम होते हैं । इस नए आयाम/अनुप्रयोग के लिए मेरी शुभकामनाऐ।

भारत सरकार विद्युत मंत्रालय के राष्ट्रीय विद्युत प्रशिक्षण प्रतिष्ठान से प्रखर मालवीय सीनियर मैनेजर तकनीकी सेवाएं, श्री निजामुद्दीन, डॉ. मंजू, प्रदीप नाग ने इस अवसर पर किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि कृषि के अवशेष जैसे पराली/ फसल अवशेष, पेड़-पौधों के पत्ते, डंठल आदि को न जलाते हुए उनका बायोमास बना सकते हैं। इन्होंने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन एवं व्याख्यान के माध्यम से किसानों को पराली जलाने से प्रकृति एवं जीवात्मा को होने वाले नुकसान एवं पराली को पैलेट में परिवर्तित करके ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के साथ को-फायरिंग करके विद्युत बनाने की नीति, प्रक्रिया एवं भविष्य की असीम संभावनाओं के बारे में बताया। विशिष्ट अतिथि श्रीमती शालिनी यादव अध्यक्ष जिला पंचायत दुर्ग ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि धान की कटाई हार्वेस्टर से की जाती है जिसके अपशिष्ट को जलाना नहीं है उसके पैलेट्स बनाकर बायोमास बनाया जा सकता है। कोयले की कमी को काफी हद तक पूरा कर सकते हैं अपशिष्ट को जलाने से कार्बन मोनोऑक्साइड जो कि जहरीली गैस है, वातावरण को प्रदूषित करती है। छत्तीसगढ़ के परिवेश में यदि छोटे-छोटे प्लांट लगते हैं तो यह उपलब्धि होगी पराली को जलाने से कृषि के लिए सहायक मित्र कीड़े भी मर जाते हैं जिससे धरती की उपजाऊ शक्ति में भारी कमी आती है।

इस अवसर पर श्रीमती संगीता साहू ने भी अपने विचार व्यक्त किए। ऑनलाइन माध्यम से श्री सुदीप नाग डायरेक्टर नेशनल मिशन बायोमास (समर्थ), ने पराली का उचित उपयोग द्वारा किसानों को फायदा एवं आमदनी का सुझाव दिया एवं डॉ मंजू मैडम प्रधान निदेशक एन.पी.टी.आई., फरीदाबाद द्वारा किसानों को कैसे सुरक्षा एवं पर्यावरण की सुरक्षा कैसे किया जाए। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ.एस.के.थापक एवं डॉ. उमेश पटेल ने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से पराली को न जलाने के लिए कृषकों को जागरूक किया। इस कार्यक्रम का संचालन एवं आभार प्रदर्शन संजय कुमार सिंह, उपनिदेशक एन.पी.टी.आई. नागपुर द्वारा किया गया।

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